गुरुवार, 8 जुलाई 2010

अभिशप्त नेपाल की राजनीति

                                                                           

                   
           कनकमणि दीक्षित
पिछले महीने जब एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) और कुछ प्रबुद्ध लोग प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल पर सत्तालोलुप होने और प्रधानमंत्री की कुर्सी नहीं छोड़ने का आरोप लगा रहे थे, खुद नेपाल ने भनक तक नहीं लगने दी कि वह इस्तीफा देने वाले हैं।
30 जून को जब उन्होंने इस्तीफा दिया, माओवादी, उनकी अपनी पार्टी के लोग, गठबंधन के सहयोगी दल सभी हैरान रह गए। इनमें नेपाली कांग्रेस भी शामिल थी, जिसने पिछले तेरह महीनों में हर मुश्किल में उनका साथ दिया था। सच्चाई यह है कि अप्रैल 2008 में संविधान सभा के चुनाव में प्रधानमंत्री नेपाल (अब कार्यवाहक) ने दो क्षेत्रों से चुनाव लड़ा था और दोनों ही जगहों से हार गए थे। यह भी सच है कि सर्वानुमति बनाने में उनकी महारत को देखते हुए खुद माओवादियों ने उन्हें संविधान सभा का सदस्य बनाने की वकालत की थी और इसी वजह से वह प्रधानमंत्री भी बन सके थे।
माओवादियों ने मई 2009 में सरकार से इस्तीफा दिया था। वजह यह थी कि सेना प्रमुख रुकमांगद कटवाल को बर्खास्त करने के प्रयास में माओवादियों ने राष्ट्रीय सेना में कमान बदलने को लेकर दुस्साहसी और अड़ियल रवैया अख्तियार कर लिया था। तभी से राष्ट्रपति रामबरन यादव और प्रधानमंत्री नेपाल माओवादियों के खास तौर पर निशाने बन गए थे। माओवादियों को जल्दी ही इस्तीफा देने की अपनी भयानक भूल का अहसास हो गया। उन्होंने प्रधानमंत्री नेपाल को अपदस्थ करने का कोई तरीका बाकी नहीं छोड़ा।
माधव कुमार नेपाल प्रारंभ से ही कमजोर प्रधानमंत्री थे। इसका प्रमुख कारण यह था कि नेपाली कांग्रेस के सुप्रीमो गिरिजा प्रसाद कोईराला ने तय किया कि बेटी सुजाता मंत्रिमंडल में उनकी पार्टी का नेतृत्व करेंगी, जो विदेश मंत्री बनीं और उपप्रधानमंत्री भी।

नतीजा यह हुआ कि दूसरी पार्टियों के दिग्गज नेताओं ने सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया। खुद नेपाल को हालांकि शुचिता और ईमानदारी के लिए जाना जाता था, लेकिन उनकी सरकार में न इच्छाशक्ति थी, न सामथ्र्य। ऊपर से कई मंत्री भ्रष्टाचार व ज्यादतियों के आरोपों से घिरे थे।
लेकिन एक कमजोर सरकार को भी संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया से ही गिराया जाना चाहिए और माओवादी यही नहीं कर पा रहे थे। सत्तारूढ़ गठबंधन की छोटी-बड़ी सभी 22 पार्टियों में माओवादियों का भय इस कदर था कि कोई भी पार्टी नेपाल सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की माओवादियों की कोशिश के समर्थन में टूटकर नहीं आई।

प्रधानमंत्री नेपाल को मजबूर करने के लिए माओवादी तीखे भाषणों और सड़कों पर उतर आए। पहले पांच महीने तो उन्होंने संसद का बहिष्कार और उसे ठप किया। बाद में दो महीने काठमांडू में कठपुतली सरकार खड़ी करने के लिए नई दिल्ली को दोषी ठहराते हुए उग्र-राष्ट्रवादी और भारत-विरोधी अभियान छेड़ दिया।
उससे भी बात नहीं बनी तो सीधा कार्रवाई करते हुए मई की शुरुआत में अनिश्चितकालीन राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल कर दी। उन्हें लगता था कि इसके बाद जनता विद्रोह कर देगी और सरकार गिर जाएगी। लेकिन हुआ यह कि योजना व तैयारी के साथ आयोजित उनकी मई दिवस रैली पर काठमांडु के दरबार चौक में आयोजित स्वत:स्फूर्त शांति सभा भारी साबित हुई।

आम हड़ताल से मकसद नहीं सधा। नेपाल सरकार तो नहीं ही झुकी, देश भर में माओवाद-विरोधी भावना गहराने लगी। लोग कहने लगे कि माओवादी अध्यक्ष पुष्प कमल दहल ने पिछले वर्ष गंवाई प्रधानमंत्री की कुर्सी वापस पाने के अपने निजी एजेंडे के लिए पार्टी और समाज दोनों को बंधक बना लिया है। अंतत: हड़ताल वापस लेनी पड़ी।
जून 2010 के घटनाक्रम को लेकर खुद माओवादी नेताओं में मतभेद उभरने लगे। पार्टी ने तय किया कि वह सरकार के बजट का समर्थन नहीं करेगी। प्रधानमंत्री नेपाल इस आशंका से भी घिरे थे कि उन्हीं की पार्टी के कुछ नेता अध्यक्ष झलनाथ खनाल के नेतृत्व में संसद के पटल पर बजट को चुनौती दे सकते थे।

इससे सरकार अपमानजनक ढंग से गिरती। लिहाजा प्रधानमंत्री नेपाल ने खुद इस्तीफा देना बेहतर समझा। अध्यक्ष खनाल को हमेशा लगता था कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर उनका हक है और उनके साथ धोखा किया गया है। इसलिए पूरा साल उन्होंने अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ बयान देते हुए बिताया।

राष्ट्रपति यादव ने सभी राजनीतिक दलों से कहा है कि वे सरकार के नेतृत्व के लिए सर्वानुमत उम्मीदवार 7 जुलाई तक खोज लें। इस समय सीमा में यह हो पाना अब संभव दिखाई नहीं देता। संविधान की रचना के लिए बेहतर यही है कि सभी दलों की राष्ट्रीय सरकार सत्ता में आए, लेकिन साफ है कि बहुमत-प्राप्त गठबंधन सरकार ही बन सकती है।

संभावना कम है कि अन्य बड़ी पार्टियां यूसीपीएन (माओवादी) को गठबंधन का नेतृत्व सौंपने पर राजी होंगी। बावजूद इसके कि यह सदन में 38 फीसदी उपस्थिति के साथ सबसे बड़ी पार्टी है। अन्य दल माओवादियों को समर्थन देने से इसलिए हिचकते हैं क्योंकि उन्होंने अपने सैन्य और अर्धसैन्य संगठनों को कायम रखा है।

कुछ लड़ाकों को सेना में शामिल करके और बाकी को एक फॉर्मूले के तहत बसाकर इन संगठनों को खत्म करने पर वे टालमटोल कर रहे हैं। इस वक्त माओवादी भीतर से और भी कमजोर हो गए हैं। शिखर के तीन नेताओं पुष्प कमल दहल, बाबूराम भट्टराई और मोहन वैद्य में मतभेद की वजह से उनके लिए संयुक्त रूप से काम कर पाना मुश्किल हो गया है। ये मतभेद पिछले हफ्ते और तीव्र ही हुए हैं। नेपाली कांग्रेस ने दावा किया है कि अगला प्रधानमंत्री उनकी पार्टी का हो। सच यह है कि हाल ही में एकीकृत हुई कांग्रेस भी चार बार प्रधानमंत्री रह चुके शेर बहादुर देउबा और संसदीय दल के निर्वाचित नेता राम चंद्र पौडेल के बीच बंटी हुई है।
अगला प्रधानमंत्री जो भी हो, उसके कंधों पर पहली जिम्मेदारी राजनीतिक स्थिरता लाने और शांति प्रक्रिया को पूर्णता तक पहुंचाकर समाज को राहत देने की होगी। तभी लोकतांत्रिक संविधान की रचना के लिए जरूरी परिस्थितियों का निर्माण हो सकेगा। माओवादियों के जनयुद्ध और अप्रैल 2006 के जनांदोलन के बाद पूरे चार सालों से लगभग ठप पड़े समाज के लिए यह राहत बेहद जरूरी है।

अगला प्रधानमंत्री यूसीपीएन (माओवादी) की जमात से हो, इसके लिए जरूरी होगा कि पार्टी माओवादियों छावनियों को और यूथ कम्युनिस्ट लीग की बैरकों को खत्म करने के लिए विश्वसनीय समय सीमा में तेजी से कदम उठाए। अध्यक्ष दहल को भी पार्टी की ओर से किसी ओर को सरकार का नेतृत्व सौंपने के लिए राजी होना होगा।

ये दोनों ही चीजें निकट भविष्य में होती दिखाई नहीं देतीं, इसलिए संभावना यही है कि नेपाल का नया प्रधानमंत्री नेपाली कांग्रेस या सीपीएन(यूएमएल) का होगा। संभावित दावेदार राम चंद्र पौडेल, झलनाथ खनाल या एक बार फिर माधव कुमार नेपाल हो सकते हैं।

 लेखक नेपाल के प्रतिष्ठित पत्रकार हैं।

बुधवार, 30 जून 2010

असकार का मतलब समझते हो प्रोफेसर सत्या कुमार?

पहाड़ हो चाहे मैंदान, मरूस्थल हो चाहे समुद्री किनारा- जल, जंगल, जमीन से बेदखल किए जाते स्थानीय निवासियों पर चलने वाले डण्डे की मार एक जैसी ही है। हरे चारागाहों के शिकारी पर्यावरण और पारिस्थितिकी संतुलन जैसे तर्कों से लदी भाषा के साथ न सिर्फ कानूनी रूप से बलपूर्वक, बल्कि जनसंचार के माध्यमों के द्वारा विभ्रम फैलाकार सामाजिक रुप से भी, खुद को दुनिया को खैरख्वाह और स्थानीय निवासियों को उसका दुश्मन करार देने की कोशिश में जुटे हैं। पहाड़ के एक छोटे से हिस्से लाता गांव में उत्तर चिपको आंदोलन के बाद शुरु हुए  छीनों-झपटो आंदोलन के प्रणेता धन सिंह राणा का यह खुला पत्र जिसका संपादन डॉ सुनील कैंथोला ने किया है, ऐसे ही सवालों से टकराता हुआ कुछ प्रश्न खड़े कर रहा है। पत्र मेल द्वारा भाई सुनील कैंथोला के मार्फत पहुंचा है।     



असकार का मतलब समझते हो प्रोफेसर सत्या कुमार?

सेवा में,
प्रो.सत्या कुमार
भारतीय वन्य जीव संस्थान
देहरादून, भारत


आदरणीय साहब,
आशा है कि आप स्वस्थ और राजी खुशी होंगे और आपका रिसर्च करने का धंधा भी ठीक-ठाक चल रहा
होगा। हम भी यहां गांव में ठीक-ठाक हैं। ऐसा कब तक चलेगा, ये तो ऊपर वाला ही जानता है लेकिन हमारा अभी तक भी बचे रहना किसी चमत्कार से कम नहीं है। क्योंकि गांव में सड़क से ऊपर पर्यावरण संरक्षण का शिकंजा है और सड़क से नीचे बन रहे डाम का डंडा हम सब पर बजना शुरू हो चुका है। यहां पिछले कई वर्षों से हम आपका बड़ी बैचेनी से इंतजार कर रहे हैं। हमें लगा कि जो व्यक्ति पर्यावरण का इतना बड़ा पुजारी है कि जिसके शोध के हिसाब से हमारी भेड़-बकरी के खुर पर्यावरण को हानि पहुंचाते हैं, जो नंदा अष्टमी के अवसर पर नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क में सदियों से चली आ रही दुबड़ी देवी की पूजा तक को बंद करवाकर इस आजाद देश में धार्मिक स्वतंत्रता के हमारे मौलिक अधिकार तक छीन ले, वह महान वैज्ञानिक हमारे गांव की तलहटी पर बन रहे डाम से होने वाली पर्यावरणीय क्षति को लेकर अवश्य चिंतित होगा और अपनी वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर बांध का निर्माण चुटकी बजाते ही रुकवा देगा। अब हमें लगने लगा है कि हो न हो दाल में जरूर कहीं कुछ काला है। अत: इस शंका के निवारण के लिए ही गांव के बड़े बुजुर्गों की सहमति से यह पत्र आपको लिख रहा हूं।
आदरणीय साहब,
आप तो हिमालय के चप्पे-चप्पे में घूमे हैं। आपकी शिव के त्रिनेत्र समान कलम ने हिमालय में निवास करने
वाले लाखों परिवारों की आजीविका और संस्कृति का संहार किया है। पूरे विश्व का बि(क समाज आपके इस
पराक्रम के आगे नत मस्तक है। ऐसे में हे! मनुष्य जाति के सर्वश्रेष्ठ संस्करण, आपकी ही कलम से ध्वस्त हुआ
मैं, धन सिंह राणा और उसका समुदाय, आपको, आपके जीवन के उन गौरवशाली क्षणों की याद दिलाना चाहते हैं, जब आपने हमारा आखेट किया था।

हे ज्ञान के प्रकाश पुंज,

नाचीज, ग्राम लाता का एक तुच्छ जीव है, जो पिछले जन्मों के पापों के कारण मनुष्य योनि में पैदा हुआ। मेरा
गांव उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली की नीति घाटी में स्थित है। यह इलाका भारत में पड़ता है और पूरे विश्व में नंदा देवी बायोस्फेयर रिजर्व के नाम से जाना जाता है। यदि मेरी स्मृति सही है, तो हमारी भूमि पर आपके कमल रूपी चरण पहली बार संभवत: 1993 में पड़े थे। आप भारतीय सेना के एक अभियान दल के साथ नंदादेवी कोर जोन के भ्रमण पर आए थे, जिसमें सेना के सिपाहियों ने नंदा देवी कोर जोन से कचरा साफ किया था। आपसे दिल की बात कहना चाहता हूं, जिसे आप लोग कचरा कह रहे थे, उसमें अनेक चीजें ऐसी थी कि जिन्हें देखकर हमारी लार टपक रही थी। मुझे याद है कि जब अपने गांव से हम लोग पोर्टर बनकर नंदादेवी बेस कैंप जाते थे, तब महिलाओं का एक ही आग्रह होता था कि बेस कैंप से दो-चार खाली टिन के डिब्बे लाना मत भूलना। टिन के ये खाली डिब्बे हमारे नित्य जीवन में बड़ी सक्रिय भूमिका निभाया करते थे। अभियान दल की वापसी पर आप लोगों द्वारा ग्राम रैंणी के पुल पर एक मीटिंग का भी आयोजन किया था, जिसमें आपने फौज द्वारा लाए गए कचरे को हमारे सामने कुछ ऐसे प्रस्तुत किया था, जैसे कि वह हमारे द्वारा प्रकृति के साथ किए गए अपराध का ठोस सबूत हो।
...जारी

सोमवार, 21 जून 2010

यादों के झरोखों में पिता

                                                                                         रस्किन बॉन्ड

जब आपकी उम्र महज नौ बरस हो और आपको स्कूल से एक पूरे के पूरे दिन की छुट्टी मिल जाए और आप अपने अद्भुत और महान पिता के साथ एक समूचा यादगार दिन बिता सकें, तब तो निश्चित तौर पर वह दिन और वह साल आपकी जिंदगी का सबसे बेहतरीन साल होगा। भले ही उसके बाद दुख और असुरक्षा का कभी न खत्म होने वाला सिलसिला हो, लेकिन वह एक साल तो सबसे अनूठा होगा ही।

यह मेरे माता-पिता के एक-दूसरे से अलग हो जाने के बाद की बात है। उस समय द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पिताजी रॉयल एयर फोर्स (आरएएफ) की नौकरी में थे। उस दौरान वे गर्मियों और जाड़ों की छुट्टियों में नई दिल्ली में अलग-अलग जगहों पर किराए पर लिए अपार्टमेंट में मुझे अपने साथ ले जाया करते थे - हेली रोड, अतुल ग्रोव लेन, सिंधिया हाउस। किराए पर अपार्टमेंट इसलिए क्योंकि उन्हें जो क्वार्टर मिला था, उसमें किसी बच्चे को रखने की इजाजत नहीं थी। मुझे यह किराए के अपार्टमेंट वाला मामला बहुत सही लगता था।

दिल्ली में मैंने बहुत शानदार वक्त बिताया। वहां मैं सिनेमा देखने जाता, मिल्क शेक गटकता, पिता के स्टैंप कलेक्शन में उनकी मदद करता। इस तरह मैंने अद्भुत वक्त गुजारा, लेकिन यह सुंदर वक्त हमेशा नहीं बना रह सका और जब मेरे पिता का तबादला कराची हो गया तो उनके पास सिवाय इसके और कोई विकल्प नहीं था कि वे मुझे बोर्डिग स्कूल में डाल दें। वह शिमला का बिशप कॉटन स्कूल था।
हालांकि मैं एक शर्मीला लड़का था, पर मैं उस छोटे से स्कूल के दोस्ताना माहौल में बहुत अच्छे से रच-बस गया था। लेकिन मुझे अपने पिता और उनके साथ की बहुत याद आती थी और जब गर्मियों के बीच मिली छुट्टी में वे मुझसे मिलने आए तो मैं खुशी और उत्साह से फूला नहीं समाया। पिताजी के पास एक-दो दिनों की ही छुट्टियां थीं, इसलिए वह मुझे सिर्फ एक दिन अपने साथ बाहर घुमाने के लिए ले गए और शाम को वापस स्कूल लाकर छोड़ दिया।

पिताजी जब रॉयल एयर फोर्स की अपनी यूनिफॉर्म में आते थे तो मुझे उन पर बहुत गर्व महसूस होता था। यूनिफॉर्म पर फ्लाइट लेफ्टीनेंट का बैच साफ नजर आता था। उसी समय पिताजी की पदोन्नति हुई थी। वह चालीस वर्ष के हो चुके थे और अब ज्यादा हवाई जहाज नहीं उड़ाते थे। वह नाटे कद के और थोड़े गठीले बदन वाले थे। वह थोड़े गंजे हो रहे थे, लेकिन अपनी यूनिफॉर्म में बहुत स्मार्ट लगते थे। मैंने उन्हें सैल्यूट किया। मुझे सैल्यूट करना बहुत पसंद था। उन्होंने भी वापस पलटकर मुझे सैल्यूट किया और उसके बाद आगे बढ़कर मुझे गले से लगा लिया और मेरे माथे को चूमा।
‘और बेटा, आज तुम क्या करना पसंद करोगे?’

‘चलिए डेविको चलते हैं।’ मैंने तपाक से कहा।

डेविको शहर का सबसे अच्छा रेस्टोरेंट था, जो अपनी मेरैंगे, मार्जीपैन, करी पफ (मिठाई के प्रकार) और पेस्ट्री के लिए प्रसिद्ध था। इसलिए हम डेविको गए और फिर जाहिर सी बात है कि वहां पर मैं मिठाइयों के ऊपर टूट पड़ा, जैसे एक छोटा स्कूल का बच्च ही टूट सकता है।

दोपहर के खाने में तो अभी काफी वक्त है। तो क्यों न थोड़ा टहल लिया जाए,’ पिताजी ने सुझाव दिया। साथ में और भी ढेर सारी पेस्ट्री लेकर हम मॉल से बाहर निकल आए और जैको पहाड़ी के ऊपर बंदरों वाले एक मंदिर के पास टहलने लगे। यहां पर बंदरों ने पेस्ट्री का काम तमाम कर दिया और हमें उससे निजात दिला दी। एक बंदर मेरे हाथ से पेस्ट्री का पैकेट छीनकर भाग खड़ा हुआ। फिर इससे पहले कि मुझे दोबारा भूख लग जाए, हम जल्दी-जल्दी में लौटकर नीचे आए। छोटे बच्चों और बंदरों में काफी समानता होती है।

पिताजी ने एक आइडिया दिया कि क्यों न रिक्शे पर बैठकर इलिजियम पहाड़ी का चक्कर लगाया जाए और हमने बड़ी स्टाइल से ये काम किया। हम चार हट्टे-कट्टे कद्दावर रिक्शे वालों के रिक्शे पर बैठे। पिताजी ने इसी दौरान मौके का फायदा उठाते हुए मुझे किपलिंग की कहानी फैंटम रिक्शा सुनाई (ये छपी किताब के रूप में फैंटम रिक्शा ढूंढ़ने से पहले की बात है)। साथ ही और भी कई मजेदार कहानियां सुनाईं, जिन्हें सुनकर मेरी भूख दुगुनी हो गई।

हमने वेनेगर में खाना खाया और फिर पिताजी ने कहा, ‘बहुत हो गया रस्किन, चलो अब सिनेमा देखने चलते हैं।’ मुझे सिनेमा देखने का बेहद शौक था। मैं दिल्ली के सिनेमा हॉलों को बहुत करीब से जानता था और शिमला के सिनेमा हॉल खोजने में भी मुझे ज्यादा वक्त नहीं लगा।

हम रिवोली सिनेमा गए। रिवोली नीचे आइस स्केटिंग रिंक और ओल्ड ब्लेसिंगटन होटल के पास था। फिल्म भी किसी आइस स्केटर के बारे में थी। फिल्म की हिरोइन थी सोंजा हेनी, जो नॉर्वे की खूबसूरत और जवान ओलिंपिक चैंपियन थी और उसने हॉलीवुड की कुछ संगीतमय फिल्मों में काम किया था। पूरी फिल्म में उसे कुछ खास नहीं करना था सिवाय स्केटिंग करने के और खूबसूरत दिखाई देने के और उसने पूरे कौशल के साथ यह भूमिका निभाई। मैंने निश्चय किया कि मैं सोंजा हेनी से प्यार करूंगा, लेकिन जब तक मैं बड़ा हुआ और मेरे स्कूल की पढ़ाई खत्म हुई, उसने स्केटिंग करना और फिल्मों में काम करना बंद कर दिया। जाने सोंजा हेनी का क्या हुआ?
फिल्म खत्म होने के बाद स्कूल वापस लौटने का समय हो चुका था। हम छोटा शिमला के पूरे रास्ते पैदल चलते हुए आए। हम अगली जाड़े की छुट्टियों के बारे में बात करते रहे और इस बारे में कि जब युद्ध खत्म हो जाएगा तो हम कहां जाएंगे। पिताजी ने कहा, ‘अब मैं कलकत्ता में रहूंगा। वहां किताबों की दुकानें, सिनेमा हॉल और चायनीज रेस्टोरेंट हैं। हम ढेर सारे ग्रामोफोन रिकॉर्ड खरीदेंगे और स्टैंप कलेक्शन को और बढ़ाएंगे।’ उस वक्त शाम हो चुकी थी, जब हम धीरे-धीरे कदम बढ़ाते स्कूल के गेट पर पहुंचे। वहां दो दोस्त बिमल और रियाज मेरा इंतजार कर रहे थे। पिताजी ने उनसे बात की और उनके घरों ंके बारे में पूछा। तभी घंटी टनटनाने लगी। हम सबने एक-दूसरे को गुडबाय कहा।
‘रस्किन, इस दिन को याद रखना।’ पिताजी ने कहा। फिर उन्होंने आहिस्ता से मेरे सिर को थपथपाया और वापस चले गए।

मैंने उन्हें फिर दोबारा कभी नहीं देखा।

तीन महीने बाद मुझे पता चला कि कलकत्ता के एक मिल्रिटी अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई। मैं आज भी कई बार उन्हें सपने में देखता हूं और मेरे सपनों में वह हमेशा बिल्कुल वैसे ही होते हैं- मेरा ख्याल रखते हुए, मेरी हथेली थामकर मुझे जाने-पहचाने रास्तों पर टहलाते हुए। और बेशक, मुझे वह दिन अच्छी तरह याद है। तकरीबन 65 साल गुजर चुके हैं, लेकिन वह दिन ऐसे ताजा है मानो कल की ही बात हो।
लेखक पद्मश्री से सम्मानित ब्रिटिश मूल के साहित्यकार हैं।

शनिवार, 12 जून 2010

पहाड़ की ढलानों पर

पहाड़ की

इन ढलानों पर

कपास के फाहे

की तरह गिरती है बर्फ़

और ज़िंदगी बुनती है

भविष्य के सपने।

पहाड़ की

इन ढलानों पर

अठखेलियाँ करती है चाँदनी

रात भर।

अलसायी धूप की लकीरें

डालती हैं डेरा

दिन भर।

पहाड़ की

इन ढलानों पर

बर्फ़ के पिघलते ही

महकते हैं वनफूल।

हवा के संग

गूँजते हैं लोकगीत

बजते हैं ढोल-नगाड़े

झूमते हैं देवता

ज़िंदगी चहक उठती है

पहाड़ की

इन ढलानों पर।

दूर कहीं जलती है

लालटेन

पगडंडी से होकर

ज़मीन पर उतर आता है आसमान

पहाड़ की

इन ढलानों पर


- मुरारी शर्मा

सोमवार, 17 मई 2010

मेरे घर के मेहमान

रस्किन बॉन्ड
जब हिमालय की वादियों में कोहरा उतरता है और मानसून की बारिश पहाड़ियों को भिगो देती है, तो यह लाजिमी ही है कि जंगली पशु, पक्षी, कीट-पतंगे सिर छुपाने के लिए किसी आसरे की तलाश में निकल पड़ें। तूफान आने की स्थिति में तो किसी भी जगह से उनका काम चल जाता है।

कई बार तो जंगल में मौजूद मेरा कॉटेज भी इन वन्यजीवों के लिए सबसे आरामदेह पनाहगाह बन जाता है। हालांकि इसमें शक नहीं कि मैं भी अपने कॉटेज की तमाम खिड़कियां खुली छोड़कर भीतर आने में उनकी मदद ही करता हूं। मैं उन लोगों में से हूं, जिन्हें अपने घर में खूब सारी ताजा हवा अच्छी लगती है और यदि हवा के साथ कुछ परिंदे, वन्यजीव या कीड़े-मकोड़े भी भीतर चले आएं तो मुझे कोई हर्ज नहीं। बशर्ते वे मुझे बहुत ज्यादा तकलीफ में न डालें।

लेकिन मैं स्वीकार करता हूं कि पिछली रात एक गुबरैले के कारण मेरा धीरज जवाब दे गया। वह गुबरैला सीधे मेरे पानी के जग में आ गिरा था। मैंने उसे उठाया और खिड़की से बाहर फेंक दिया। लेकिन चंद सेकंडों बाद वह फिर भुनभुनाता हुआ मेरे कमरे में आ गया और छपाक से उसी जग में जा गिरा। मैंने उसे एक दफा फिर बाहर निकाला और रात की आजादी का लुत्फ उठाने के लिए बाहर छोड़ दिया। लेकिन उसे मेरे कमरे की रोशनी और गर्माहट ज्यादा लुभा रही थी, इसलिए वह फिर भीतर आ गया और किसी हेलीकॉप्टर की तरह कमरे में चक्कर काटने लगा। वह नीचे उतरने के लिए कोई उचित जगह तलाश रहा था। मैंने जल्दी से अपने पानी के जग को ढंक दिया। आखिरकार वह जंगली डेहलिया के फूलों से भरे एक मर्तबान में जा गिरा। इस दफा मैंने उसे नहीं छेड़ा। अब वह फूलों की नर्म बिसात पर आराम फरमा सकता था।

कभी-कभी दिन के समय एक नन्हा सा परिंदा मेरे घर आ जाता है। यह गाढ़े जामुनी रंग की सारिका है, जो दाएं-बाएं फुदकती रहती है। लेकिन मेरे घर में शायद वह इतनी घबराई हुई होती है कि वह कुछ नहीं गाती। वह खिड़की के नीचे अपना बसेरा बना लेती है और बाहर बारिश को निहारती रहती है। लेकिन उसे ज्यादा नजदीकी पसंद नहीं। मैं इधर अपनी कुर्सी पर चुपचाप बैठा रहता हूं और उधर वह चिड़िया खिड़की पर बैठी रहती है। कभी-कभी वह सिर घुमाकर मेरी तरफ देख लेती है कि कहीं मैं उसके करीब आने की कोशिश तो नहीं कर रहा। बारिश थमने पर वह बाहर उड़ जाती है। बाहर जाकर ही उसका आत्मविश्वास लौट पाता है और वह गाना शुरू कर देती है। बीच-बीच में टूटता हुआ मीठा स्वर, जो वादी में गूंजता रहता है और जिसे आप कभी नहीं भूल सकते।

कभी-कभी एक गिलहरी चली आती है। खास तौर पर तब जब बलूत के पेड़ पर उसके कोटर में पानी घुस आता है। वो मुझे भली तरह पहचानती है और खाने के टुकड़ों की तलाश में बेधड़क मेरे खाने की टेबल तक चली आती है। मैं जानबूझकर उसके लिए वहां कुछ निवाले छोड़ देता हूं। अगर वह मुझसे थोड़ा और पहले मिली होती तो मैं उसे अभी तक अपने हाथों से खाना सिखा चुका होता। मुझे यह सब भाता है। मुझे पालतू जानवरों की जरूरत महसूस नहीं होती। मेरे लिए मेरे ये मेहमान ही काफी हैं।

पिछले हफ्ते जब मैं अपनी डेस्क पर बैठा एक लंबा लेख लिख रहा था, तब अचानक हल्के हरे रंग के एक टिड्डे को अपने पैड पर बैठा देख मैं चौंक गया। हम दोनों एक-दूसरे को ताकते रहे। जब मैंने उसे हल्के से धकियाया तो वह धीमे से वहां से जाने लगा। बाद में मैंने उसे विटमैन की लीव्ज ऑफ ग्रास की जिल्द का मुआयना करते हुए पाया। उसके बाद वह दो दिन तक नजर नहीं आया। दो दिन बाद वह मुझे अपनी ड्रेसिंग टेबल पर नजर आया, जहां वह खुद को एक आईने में निहार रहा था। लेकिन शायद मैं गलत हूं। वह खुद को निहार नहीं रहा था, शायद उसे लगा हो कि वहां एक और टिड्डा है और वह उससे जान-पहचान करने की कोशिश कर रहा हो।

उसके बाद मुझे अपने बगीचे में एक और टिड्डा नजर आया। वह जास्मीन की झाड़ियों में बैठा हुआ था। उसकी बाहें किसी मुक्केबाज की तरह खुली हुई थीं। मुझे लगा वह मेरे घर वाले टिड्डे को बुला रहा है। मैं भीतर गया और टिड्डे को ले आया। मैंने दोनों को साथ-साथ रख दिया। लेकिन यह क्या, उसे तो इस बगीचे वाले टिड्डे की शक्ल ही पसंद नहीं आई और वह वहां से भाग खड़ा हुआ। आईने में उसने अपनी जो शक्ल देखी थी, आखिर उससे इसकी तुलना कहां?

लेकिन मेरा सबसे दिलचस्प मेहमान रातों को आता है। और वह है एक नन्हा चमगादड़। वह कभी दरवाजे से तो कभी खिड़की से भीतर चला आता है। मैंने आज तक जितने भी चमगादड़ देखे, वे सभी ऊपर छत से लगभग सटकर उड़ते हैं। लेकिन यह नन्हा चमगादड़ काफी नीचे उड़ता है, जैसे कोई बमवर्षक विमान हो। वह मेरे फर्नीचर के नीचे तक पहुंच जाता है और कभी टेबल की टांगों के इर्द-गिर्द यहां-वहां टकराता हुआ उड़ता रहता है। एक बार तो ऐसा भी हुआ कि वह मेरे कमरे में डगमगाते हुए उड़ता रहा और फिर मेरी टांगों के बीच से निकल गया!

मैंने सोचा क्या उसका रडार काम नहीं कर रहा है या वह कोई सिरफिरा चमगादड़ है? मैंने अपनी किताबों की अलमारी में प्राकृतिक इतिहास की किताबें टटोलीं और चमगादड़ों की किस्मों के बारे में जानने की कोशिश की, लेकिन मुझे इस तरह का कोई उदाहरण नहीं मिला। आखिरकार मैंने एक काफी पुरानी किताब (वर्ष 1884 में कलकत्ता से छपी स्टर्नडेल की किताब इंडियन मैमालिया) की शरण ली। और मेरी खुशी का तब कोई ठिकाना नहीं रहा, जब मुझे वहां वह चीज मिल गई, जिसकी मैं तलाश कर रहा था। किताब में साफ-साफ लिखा था कि कैप्टन हटन को मसूरी के नजदीक दक्षिणी श्रंखला पर 5500 फीट ऊंचाई पर ऐसा चमगादड़ मिला था, जो ऊंचे उड़ने की बजाय काफी नीचे उड़ा करता था। यह चमगादड़ महज 1.4 इंच का था और सामान्यत: हिमालय के दक्षिण पश्चिम में स्थित झरीपानी में पाया जाता था। वर्ष 1884 में भी इस किस्म का चमगादड़ काफी दुर्लभ ही हुआ करता था।

शायद मेरी मुठभेड़ इस प्रजाति के कुछ दुर्लभ जीवित बचे सदस्यों में से किसी एक से हो गई थी। जहां मैं रहता हूं, वहां से झरीपानी महज दो मील दूर है। मुझे खासा अफसोस हुआ कि आधुनिक प्राणीविज्ञानियों ने इस नन्हे चमगादड़ की प्रजाति पर कोई ध्यान ही नहीं दिया। शायद उन्हें ये लगता है कि इस तरह की प्रजाति पहले ही विलुप्त हो चुकी है। यदि ऐसा है तो मुझे बेहद खुशी है कि मैंने उनमें से एक को ढूंढ़ निकाला। मैं खुश हूं उसे मेरे छोटे-से घर में सिर छुपाने लायक जगह मिल जाती है और मुझे भी उसके बारे में कविता या गद्य में कुछ न कुछ लिखने का मौका मिल जाता है।

लेखक पद्मश्री से सम्मानित ब्रिटिश मूल के साहित्यकार हैं।

सोमवार, 10 मई 2010

क्या सोचते होंगे पहाड़?

विनोद भारद्वाज

सुबह-सुबह शिमला से निकलकर कुफ्री व फागू के घुमावदार रास्तों पर टैक्सी चलाते मंगतराम के मन में पहाड़ों के बदलते हालात को लेकर जो भाव आ रहे थे, शायद वह उन्हें मुझसे बांटना चाह रहा था। आखिर एक बेहद हरीभरी घाटी के पास गाड़ी रोककर उसने जब यह बताया कि इससे ज्यादा घनी व सुरम्य घाटी आपको हिमाचल में शायद ही देखने को मिले, तो लगा कि उसे अपनी इस धरोहर पर तो गर्व है, लेकिन इस बात की पीड़ा भी है कि पहाड़ के अन्य हिस्सों की सघनता व हरियाली अब अपना स्वरूप खोती जा रही है। वास्तव में उस घाटी को देखकर मुझे भी लगा कि जब मेजर सर विलियम लायड शिमला में भवन बनाने के लिए जमीन का जायजा ले रहे थे तो उन्होंने ठीक ही टिप्पणी की थी कि पहाड़ की हवा एक तेज की तरह मेरी धमनियों में समा गई, जिससे मुझे लगा कि मैं सबसे गहरी संकरी घाटी में कुलांचे भर सकता हूं अथवा उतनी ही आसानी से पहाड़ के दुरारोह छोरों तक फुर्ती से उछलता जा सकता हूं... आज का दिन मैं कभी नहीं भूलूंगा।



घाटी के उस मोह से निकलकर जब हम फागू की तरफ बढ़े तो पहाड़ों की बदहाली पर मंगतराम लगातार बोलता रहा। अंग्रेजों का जमाना देख चुके उन हिंदुस्तानियों की तरह वह भी अंग्रेजी राज का प्रशंसक लगा जो मानते हैं कि स्वराज तो आया पर सुराज की जगह हमारे लोकतंत्र ने अराजकता को ही जन्म दिया। इसलिए लोकराज से तो अंग्रेजों का राज ठीक था। मंगतराम को इस मुद्दे पर जब मेरा कोई साथ नहीं मिला तो वह उन इमारतों, पुलों व सड़कों के बारे में बताने लगा जो अंग्रेजों ने सौ साल से अधिक समय पहले बनवाए थे और ऐसे निर्माण आज भी अपनी आभा व मजबूती के साथ विद्यमान हैं। कुशल कार चालन और अपनी तमाम जानकारियों के साथ जब मंगतराम ने मुझे जाखू की खूबसूरत पहाड़ी पर ले जाकर खड़ा किया तो मानो मन से कई तरह की परतें हटती चली गईं। याद आया कि पंडित नेहरू अक्सर पहाड़ों के बारे में कहा करते थे कि मेरी आंखों के सामने सदैव पहाड़ों का दृश्य घूमता रहता है और वहां के खतरे भी सुहाने लगते हैं। मेरा हृदय सदैव उन शांत हिमकणों के लिए तरसता रहता है।

पहाड़ों के मौन पत्थरों की भाषा पढ़कर ही नेहरू ने कभी सन उन्नीस सौ पैंतीस में अपने एक लेख में यह भी लिखा था कि इन पत्थरों ने अपनी लंबी जिंदगी में न जाने कितनी बातें देखीं। इनके सामने बड़े-बड़े साम्राज्य गिरे, पुरानी सल्तनतों का नाश हुआ, धार्मिक परिवर्तन हुए। खामोशी से इन पहाड़ों ने यह सब देखा और हर क्रांति और बदलाव पर उसने अपनी भी पोशाक बदली। वर्षों के तूफानों को इन्होंने बर्दाश्त किया, बारिश ने उन्हें धोया, हवा ने अपने बाजुओं से उनको रगड़ा। कभी-कभी मिट्टी ने उनके बहुत से हिस्से को ढंक दिया। फिर भी बुजुर्गी और शान उनके एक-एक हिस्से से टपकती है। मालूम होता है कि उनकी रग-रग और रेशे-रेशे में हजारों वर्षों का तजुरबा भरा पड़ा है।

इतने लंबे समय तक प्रकृति के खेलों और तूफानों को बर्दाश्त करना बेहद कठिन था, लेकिन उससे अधिक कठिन था मनुष्यों की हिमाकतों व लालच को सहना। पर उन्होंने यह सब भी सहा। पहाड़ों के इन पत्थरों की खामोश निगाहों के सामने साम्राज्य खड़े हुए और गिरे, मजहब उठे और बैठे, बड़े से बड़े बादशाह, खूबसूरत से खूबसूरत औरतें, लायक से लायक आदमी चमके और फिर अपना रास्ता नापकर गायब हो गए। हर तरह की वीरता इन पत्थरों ने देखी और देखी हर तरह की नीचता और मनुष्य का कमीनापन। बड़े और छोटे, अच्छे और बुरे सब आए और चल बसे, लेकिन ये पत्थर आज भी कायम हैं। क्या सोचते होंगे ये पत्थर! जब वे आज भी अपनी ऊंचाई से देखते होंगे, बच्चों के खेल, बड़ों की लड़ाई, फरेब और बेवकूफी! हजारों सालों में आदमी ने कितना कम सीखा। कितने और दिन लगेंगे इनको अक्ल और समझ आने में? शायद मंगतराम की भी यही पीड़ा रही हो।

शनिवार, 1 मई 2010

बदल जाएगा एवरेस्ट का इतिहास



दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को क्या तेनजिंग नोर्गे और एडमंड हिलेरी से पहले भी किसी ने फतेह कर लिया था यह सवाल आज भी रहस्य बना हुआ है। लेकिन हो सकता है 2011 में इस रहस्य से पर्दा उठ जाए। अमेरिकी एवरेस्ट रिसर्चर टॉम हॉलज़ेल इस काम को अमलीजामा पहनाने की तैयारी कर रहे हैं। इस काम के लिए वे बाकायदा फंड भी इकट्ठा करने में लगे हैं।
कुछ जानकारों का कहना है कि 8 जून 1924 को 38 वर्षीय जॉर्ज मेलोरी और 22 वर्षीय एंड्र्यू इरविन ने धरती की इस सबसे ऊंची चोटी को फतह कर लिया था। उस दिन मेलोरी और इरविन ने 26000 फीट (8138 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित अपना कैंप छोड़ दिया। बकौल नोएल ओडेल “वे अपनी फतह को लेकर काफी आशान्वित थे लेकिन वे उसके बाद कभी दिखाई नहीं दिए।“ नोएल उस पर्वतारोही दल का हिस्सा थे।
साल 1999 में एवरेस्ट की उत्तरी ढलान पर जॉर्ज मेलोरी का शव खोज लिया गया। कोनार्ड एंकेर और उनके खोजी दल, जो खास तौर पर मेलोरी और इरविन के शवों और उनके साजो-सामान की खोज के लिए बना था, ने एक बड़ी सफलता पाई थी। पड़ताल में मेलोरी के शव के साथ पत्रों का पुलिंदा, कलाई घड़ी, खाने का सामान, पॉकेट नाइफ और गॉगल्स मिले। लेकिन एक खास चीज जो एवरेस्ट के इस सबसे बड़े राज से पर्दा उठा सकती थी वो नहीं मिली, यानी मेलोरी का पॉकेट कोडेक कैमरा इस खोजी दल को नहीं मिल सका। ये भी माना जा रहा है कि उस वक्त शायद वह कैमरा मेलोरी के पास न होकर उनके जूनियर साथी एंड्रयू इरविन के पास रहा हो। गौरतलब है कि इरविन का शव आज तक नहीं मिल सका है।
लेकिन अब इरविन का शव मिलने की आशा बलवती हो रही है क्योंकि अमेरिकी एवरेस्ट रिसर्चर हॉलज़ेल का मानना है कि हाई रेजोल्यूशन एरियल फोटोग्राफी के जरिए उनकी टीम ने इरविन के शव को खोज लिया है। हॉलजेल और उनके पांच अन्य साथियों की द एंड्रयू इरविन सर्च कमेटी ने इरविन के शव को 27641 फीट (8425 मीटर) की ऊंचाई पर लोकेट कर लिया है। अब वे अगले साल यानी 2011 में एक खोजी अभियान चलाने वाले हैं जिसमें उन्हें इरविन का शव और वह कोडेक कैमरा मिलने की पूरी उम्मीद है।
पर्वतारोहियों का मानना है कि कैमरा बर्फ में दफन एवरेस्ट के खोल देगा। दरअसल,1924 में जॉर्ज मेलोरी और इरविन ईस्टमैन कोडेक कैमरा लेकर गए थे। इस कैमरे से खींची गई तस्वीरें ही इस बात का खुलासा कर सकती हैं कि क्या उन दोनों ने एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने में सफलता पा ली थी। हालांकि यह कैमरा अब तक किसी को नहीं मिला है, लेकिन कोडेक के विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कैमरा क्षतिग्रस्त नहीं हुआ होगा तो आज भी उसकी फिल्म से प्रिंट लिए जा सकते हैं चाहे घटना को 9 दशक पूरे होने जा रहे हों।