मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

पहाड़ों से आत्म साक्षात्कार

खूबसूरत, गुमसुम और खामोश पहाड़ किसी नेता या राजनीतिक दल की प्राथमिकताओ में कभी शामिल नही रहे। पंडित नेहरू जरूर अपवाद स्वरूप उस कड़ी में शामिल हैं जिन्होंने न केवल पहाड़ों को जिया बल्कि उसकी खूबसूरती, ताजगी और बेचैनी को बकायदा लिखकर बयां किया।मेरे सीनियर और मित्र विनोद भारद्वाज बता रहे हैं आखिर कैसे थे पहाड़ से जुड़े नेहरू के अनुभव।
 
पहाड़ों से अपने आत्म साक्षात्कार में नेहरू आगे लिखते हैं,
..पश्चिम और दक्षिण - पूर्व  की ओर हमारे बहुत नजदीक से दो - तीन हजार फुट  नीचे गहरी घाटियां दूर के प्रदेशों में जाकर मुड़ गई थीं।उत्तर की ओर नंदा देवी और सफेद पोशाक में उसकी सहेलियां सिर ऊंचा किए खड़ी थीं। पहाड़ों के करारे  बड़े डरावने थे और लगभग सीधे कटे हुए कहींं कहीं बहुत गहराई तक चले गए थे , परन्तु उपत्यकाओं के आकार तरूण पयोधरों की तरह बहुधा गोल और कोमल थे। कहीं-कहीं वह छोटे -छोटे  टुकड़ों में बंट गए थे, जिन पर हरे-हरे खेत इंसान की मेहनत को जाहिर कर रहे थे।
सबेरा होते ही मैं कपड़े उतार कर खुले में लेट जाता और पहाड़ों का सुकुमार सूर्य मुझे अपने हल्के आलिंगन में कस लेता। ठंडी हवा से कभी -कभी मैं तनिक  कांप उठता, परंतु फिर सूर्य की किरणें मेरी रक्षा के लिए आकर मुझे गर्म और स्वस्थ कर देतीं। कभी-कभी मैं चीड़ के पेड़ों  के नीचे लेट जाता।
यहां आकर नेहरू पहाड़ों के मोहक वातावरण की तुलना इस सुरम्य वातावरण से दूर मैदानी इलाकों में चल रहे सामाजिक बदलाव,पतन व राजनीति में बढ़ती कलह से करते हैं वह कहते हैं,
पर्वतों पर सन -सन करती हुई हवा मेरे कानों में उनेक विचित्र बातें मंद - मंद कह जाती। मेरी संज्ञा  उसकी थपकियों से सो सी जाती और मस्तिष्क शीतल हो जाता।  मुझे आरक्षित  देखकर वही हवा चतुराई से नीचे मैदान में संसार के मनुष्यों के शठता भरे ढंगों, सतत चलती कलहों, उन्मादों तथा घृणाओं, धर्म के नाम  पर हठधर्मी, राजनीति में व्याभिचार  और आदर्शों से पतन की ओर संकेत करती । नेहरू सोचते कि, क्या ऐसे वातावरण में लौट कर जाना उचित है ? क्या उस तरह की मनस्थिति से पुन सम्पर्क स्थापित करना  अपने जीवन के उद्योगों को व्यर्थ कर देना नहीं है ?
यहां शांति है, नीरवता है, स्वस्थ वातावरण है और संगी -साथियों  के रूप में बर्फ है पर्वत हैं, तरह - तरह  के फूल और घने पेड़ों से लदे हुए पर्वतों के बाजू है पक्षियों का कलरव गान !

जारी........

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

सूरज डूब रहा है, चोटियां चमक रही हैं

खूबसूरत, गुमसुम और खामोश पहाड़ किसी नेता या राजनीतिक दल की प्राथमिकताओ में कभी शामिल नही रहे। पंडित नेहरू जरूर अपवाद स्वरूप उस कड़ी में शामिल हैं जिन्होंने न केवल पहाड़ों को जिया बल्कि उसकी खूबसूरती, ताजगी और बेचैनी को बकायदा लिखकर बयां किया।
मेरे सीनियर और मित्र विनोद भारद्वाज बता रहे हैं आखिर कैसे थे पहाड़ से जुड़े नेहरू के अनुभव।

अपना अधिकांश समय राजनीति में बिताने वाले पं. जवाहर लाल नेहरू की रूचि बेहद व्यापक थी। यात्राओं के प्रति उनका लगाव उन्हें अक्सर पहाड़ों की ओर खींचकर ले जाता था। पहाड़ दरअसल पं. नेहरू के स्वाभाव का हिस्सा थे। सन 19३8 में जब हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन समाप्त हो चुका था और ताप्ती नदी के किनारे पर बांसों का बना अधिवेशन स्थल सूना - सूना सा लग रहा था तो फुरसत ने नेहरू को पहाड़ों पर जाने के लिए बाध्य कर दिया।
नेहरू ने अपनी मनोस्थिति इस तरह व्यक्त की "रात के बढ़ते अंधेरे में मैं ताप्ती के बहते हुए पानी की धारा तक चला गया। मुझे यह सोचकर अफसोस सा हुआ कि अधिवेशन के लिए बनाया गया यह नगर और डेरे, जो खेतों और ऊसर भूमि पर बनाए गए थे जल्द ही गायब हो जाएंगे, और फिर उनकी यादगार ही बाकी रह जाएगी"  इस विचार से नेहरू की कहीं दूर जाने की इच्छा बलवती हो गई । उन्हें शारीरिक थकान नहीं थी, दरअसल उन्हें तब्दीली और ताजगी की भूख थी । वह राजनीति के उबाने वाले माहौल से निकलने को छटपटा रहे थे। वह उन दिनो लोगों के सवालों के जवाब तो देते समय वह भरसक नम्रतापूर्वक व्यवहार करने की कोशिश करते थे, लेकिन उनका मन कहीं और ही रहता था। वह लिखते हैं " सुदूर उत्तर के पहाड़ो की गहरी घाटियों और बर्फ से ढकी चोटियों व चीड़ व देवदार के कगारों  व हल्के ढालों पर मेरा मन विचर रहा होता। अब मैं हर तरफ से घेरे रहने वाले सवालों और समस्याओं से निकलकर कोलाहल से दूर ,शांति तथा विश्राम की एक हल्की सी सांस के लिए बेचैन हो रहा था। मैंने जल्दी से इलाहाबाद से प्रस्थान किया, बाहर निकलते ही कई समस्यायें तो मेरे मन के किसी कोने में जाकर खो गईं।
कुमाऊं की पहाडिय़ों से होकर अल्मोड़े जाने वाली चक्करदार सड़क  पर जैसे  ही हम पहुंचे, मैं तो पहाड़ी हवा की मादकता में अपने को भूल सा गया।
अल्मोड़े से आगे हम खाली तक गए और अपनी इस यात्रा के आखिरी हिस्से को मजबूत पहाड़ी खच्चरों की पीठ पर तय किया। अब मैं खाली में था, जहां पहुंचने की पिछले दो वर्षों से बेचैनी हो रही थी।"
नेहरू यहां पहाड़ों के उस मनोरम दृश्यों का वर्णन करते हैं जो वही व्यक्ति महसूस कर सकता है जिसका लम्बे समय तक पहाड़ों से रिश्ता रहा हो। वे आगे लिखते हैं,
"सूरज डूब रहा था, पहाड़ी की चोटियां उसकी रोशनी में चमक रहीं थी और घाटियों में खामोशी छाई थी। मेरी आंखे  नंदा देवी और उसकी पर्वत मालाओं की सहचरी बर्फ से ढकी चोटियों को खोज रही थीं।
हल्के बादलों ने उन्हें छुपा लिया था। एक दिन जाता और दूसरा आता।  मैंने  जी भर कर पहाड़ी हवा का आनंद लिया और बर्फ तथा घाटियों की रंग -बिरंगी छटा को जमकर निहारा।
कितनी सुंदर तथा शांत थे वे! संसार की बुराइयां इनसे कितनी दूर और कितनी निस्सार थीं"।


(जारी..........)
खाली* (वर्तमान में इसे खाली स्टेट के नाम से जाना जाता है. जो बिन्सर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के अंदर  स्थित है।)

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

कत्ल होते बेजुबान, तमाशबीन हम

ये सिर्फ तस्वीरें नही हैं बल्कि  हमारे समय का भयानक सच है। और कुछ सयाने लोग इन तस्वीरों को सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट का उदाहरण कहकर भी परिभाषित कर सकते हैं। लेकिन हकीकत के एक चेहरे से कुछ यूं रूबरू होइए.......
ये वाक्या है एक हिरन की मौत का..जिसे पहले तो कुत्तों ने दौड़ा दौड़ा कर मौत के करीब पहुंचा दिया उसके बाद जब उसे बचाने के लिए जंगल और जानवरों के रहनुमाओं से कहा गया तो वो अपनी रेंज का रोना रहते रहे..ये सबकुछ हुआ विश्व प्रसिद्ध कॉर्बेट नेशनल पार्क के पास बसे गांव टेड़ा में।
मामले की जानकरी जब वन्यजीव प्रेमी और वाइल्ड रेंजर्स - कॉर्बेट के नीरज उपाध्याय को मिली तो वो फौरन मौके पर पहुंचे और घायल हिरन को देखा.उस वक्त तक हिरन जीवित था लेकिन हालत बेहद नाजुक .वाइल्ड रेंजर्स ने तुंरत ही वन विभाग के उच्च अधिकारियों को दी.लेकिन फौरी कार्यवाही के बदले अधिकारी दूसरे विभाग और दूसरे का क्षेत्र होने की बात कहकर टालते रहे.इस बीच अंधेरा गहराने लगा और डूबते सूरज के साथ ही हिरन की सांसे भी थम गई। (जैसा कि मौके पर मौजूद नीरज उपाध्याय ने बताया-देखा )

                                       



शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

देश के दुश्मनों के साथ हमें कैसा सलूक करना चाहिए?

राजधानी दिल्ली में आजादी- एक मात्र रास्ता, सेमिनार ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बडा प्रश्न तो यही है कि क्या भारतीय राष्ट्र-राज्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर पृथकतावादी ताकतों को देश की अखंडता को ललकारने की आजादी दे सकती है? 

यह सेमिनार कश्मीर की आजादी को लेकर था और यह पहली बार हुआ है कि जब सैयद अली शाह गिलानी ने दिल्ली में आकर सीधे तौर पर चुनौती दी है। बीजेपी से जरूर विरोध के स्वर आए हैं लेकिन राष्ट्रीयता से गहरे लगाव रखने का दावा करने वाली इस पार्टी ने दरअसल राष्ट्रीयता को बदनाम ही किया है। इस सेमिनार पर मनमोहन की चुप्पी असहज लगती है क्योंकि राजधानी में गिलानी भारत की संप्रभुता और प्रधानमंत्री की सत्ता को ही खारिज कर रहे थे। गृहमंत्री चिदंबरम यह कहकर बच रहे हैं कि हमने पूरे कार्यक्रम की वीडियोग्राफी की है लेकिन सवाल यही है इस सेमिनार की अनुमति ही क्यों दी गई?

याद कीजिए कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान न्यूजीलैंड के एक टीवी एंकर की उस नस्लीय टिप्पणी को जिससे मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सहित पूरा विदेश मंत्रालय बौखला गया था। भारतीय प्रतिरोध इतना मुखर था कि टीवी चैनल को मजबूरी में ही सही एंकर को बर्खास्त करना पड़ा। लेकिन यहां पाकिस्तान परस्त एक शख्स हमारी संप्रभुता और संविधान को ललकार रहा है और हम चिरखामोशी में हैं। इस मसले पर कश्मीरी पंडितों की संस्था पुन्नुन कश्मीर का आक्रामक विरोध काबिल-ए-गौर है लेकिन विरोध की इस तल्खी को भी किसी प्रिंट और न्यू मीडिया में ठीक से जगह नही मिल पाई।और अब बेचैनी इसलिए भी हैं कि क्योंकि अगर हम यूं ही चुप रहे और भारत भी रूस की तरह बिखर गया तो क्या होगा?

अपने संपादकीय मेंकुछ अखबारों ने जरूर इस सवाल को उठाया है। पेश-ए-नजर। 

राजद्रोह है इसलिए इजाजत नहीं

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अलगाव का प्रचार



गुरुवार की दोपहर जब सुरक्षा बल श्रीनगर के नजदीक एक मकान में छिपे आतंकवादियों का मुकाबला कर रहे थे, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कश्मीर की आजादी की वकालत करने के लिए एक सेमिनार हो रहा था। ‘आजादी - एकमात्र रास्ता’ इस सेमिनार की थीम थी और हुर्रियत कांफ्रेंस के कट्टरपंथी धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी इसमें प्रमुख वक्ता थे।

कश्मीरी पंडितों की संस्था ‘पुनुन कश्मीर’ के कार्यकर्ताओं ने इस सेमिनार में अलगाववादियों की मौजूदगी का तीखा विरोध किया और हंगामे के दृश्य सारे देश ने टीवी न्यूज चैनलों पर देखे। इस पूरी घटना ने देशवासियों के मन में कुछ बेचैन सवालों को जन्म दिया है। हमारा संविधान सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूलभूत अधिकार देता है। अनुच्छेद 19 में वर्णित यह अधिकार एक नागरिक के रूप में हमारी स्वतंत्रता की गारंटी है। लेकिन क्या देश की एकता व अखंडता के खिलाफ बोलना या अलगाववाद की वकालत करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है?

मुख्य विपक्षी दल भाजपा का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में देश के किसी भी हिस्से को अलग करने की वकालत नहीं की जा सकती। इसीलिए उसने केंद्रीय सत्ता की नाक के नीचे ‘अस्वीकार्य विचारों’ के प्रचार की इजाजत देने के लिए सरकार की तीखी आलोचना की है। जवाब में केंद्रीय गृहमंत्री ने कहा है कि सरकार ने पूरे आयोजन की फिल्म बनाई है और अगर कुछ ऐसा हुआ है जो संविधान सम्मत नहीं था, तो कानून मंत्रालय की राय के बाद कार्रवाई की जाएगी।संवैधानिक और राजनीतिक बहस के अलावा देश के जनमानस में बेचैनी की वजह दूसरी भी है। भारतीय राष्ट्र-राज्य की स्थापना को अभी छह दशक से कुछ ही ज्यादा समय हुआ है और राष्ट्रों के निर्माण के लिहाज से यह बहुत ज्यादा समय नहीं होता।

हालांकि इन छह दशकों में भारतीय राष्ट्र-राज्य ने काफी मजबूती हासिल की है, लेकिन फिर भी ऐसी घटनाएं स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्षो और स्वतंत्र भारत के आरंभिक वर्षो में देश के एकीकरण की स्मृतियों को ताजा कर देती हैं।
जरूरत इस बात की है कि अलगाव की वकालत करने वाले स्वरों को बढ़ने से रोका जाए। भारतीय राष्ट्र-राज्य अपने खिलाफ किसी भी तरह के हमले की इजाजत नहीं दे सकता, चाहे वह कश्मीर के अलगाववादी हों या लाल गलियारे में फैले माओवादी। जरूरत इस बात की भी है कि देश की अखंडता से जुड़े सवालों को राजनीतिक दलों के बीचमुकाबले का विषय न बनाया जाए।

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

प्रेम की उछाल ः आस्ट्रिया के नेशनल पार्क में हिरन और बारासिंगा आपस में जब मिले तो दोनों के बीच प्रेम का इजहार कुछ इस अंदाज में हुआ। एपी के फोटोग्राफर क्रिस्टीन जानसन ने प्रेम की इस उछाल को अपने कैमरे में उतारा है।