बुधवार, 24 मार्च 2010

गांधी के देश में कानू सान्याल की त्रासदी


नक्सल आंदोलन के प्रवर्तक नेता कानू सान्याल का निधन देश में राजनीतिक आंदोलनों के एक विलक्षण और संभवत: सबसे विवादास्पद अध्याय का अंत है। करीब चार दशक पहले पिछली सदी के सत्तर के दशक के आखिरी वर्षो में उन्होंने चारू मजूमदार के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल से किसानों व मजदूरों के हक में आंदोलन की शुरुआत की थी जिसे उत्तर बंगाल स्थित उनके गांव नक्सलबाड़ी के नाम पर नक्सल आंदोलन कहा गया।


यह आंदोलन राजनीतिक परिवर्तन के लिए हिंसा के प्रयोग की वकालत करता था और उस दौर में युवाओं के वर्ग को इसने खासा आकर्षित किया था। अहिंसा को बदलाव के अस्त्र के रूप में इस्तेमाल और प्रतिष्ठित करने के लिए जिस देश ने मोहनदास गांधी को महात्मा का दर्जा दिया, उसमें नक्सल आंदोलन की सफलता संदिग्ध ही थी।


यही कारण है कि कई इतिहासकार नक्सल आंदोलन को भारतीय राजनीति में एक भटकाव मानते हैं। बाद में इस आंदोलन में ही कई उतार-चढ़ाव आए। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी) नामक जिस पार्टी का उन्होंने गठन किया था, उसमें भी कई धाराएं सामने आईं जिनमें से एक ने बाद में चुनावी राजनीति को स्वीकार किया। यह भी कम विडंबना नहीं कि जीवन के आखिरी दिनों में निराश कानू सान्याल का शव उनके कच्चे मकान की छत से लटका पाया गया।
उन्होंने उन दिनों प्राण त्यागे, जब माओवादी कुछ राज्यों में बंद को सफल बनाने के लिए रेल की पटरियां उखाड़ रहे हैं। वह न इस माओवादी हिंसा के समर्थक थे और न ही इसे अंजाम देने वाले संगठन के। कानू सान्याल की राजनीतिक त्रासदी में सबक यह है कि हिंसा के माध्यम से बदलाव का रास्ता अंतत: आत्मछलना ही है, लेकिन लगता नहीं कि जिस मौजूदा माओवादी राजनीति के लिए कानू सान्याल पहले ही अप्रासंगिक हो चुके थे, वह उनकी त्रासदी से कुछ सीखने को तैयार होगी।

आज देश प्रगति की नई इबारतें लिख रहा है। आर्थिक विकास ने युवाओं में नए वैश्विक सपनों को जन्म दिया है। फिर भी हिंसक आंदोलन कायम है तो इसीलिए कि समाज के कुछ हिस्सों में विकास की लहर नहीं पहुंच सकी है।


प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि गरीबी और बेरोजगारी से निजात पाने के लिए दस फीसदी से ऊपर की विकास दर हासिल करना जरूरी है। हिंसा के रास्ते से विश्वास तभी खत्म होगा, जब समाज के पिछड़े हिस्सों तक न्याय और विकास की रोशनी पहुंचाई जा सके।
(दैनिक भास्कर से साभार)

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

भाड़े का विज्ञान और विशेषज्ञ


सुनील कैंथोला

हिंदुकुश हिमालय का एक बड़ा हिस्सा आतंकवाद और राजनैतिक अस्थिरता से ग्रस्त है। आतंक के इस खूनी खेल में भाड़े के सैनिकों की प्रमुख भूमिका है, जो लोकतंत्र और अमन-चैन को अपने पेशे के प्रतिकूल समझते हैं। दूसरी तरफ, हिमालय के ऐसे क्षेत्र जहां अमन है, लोकतंत्र है, वहां भाड़े के विशेषज्ञों का आतंक दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। भाड़े के आतंकवादियों की ही तरह इनका दीन मात्र पैसा है और इसके एवज में ये लोकतंत्र का गला घोंटने से परहेज नहीं करते। इनके आतंक में पिसती स्थानीय जनता की स्थिति किंकर्त्तव्यविमूढ़ जैसी होकर रह गई है। अब भारत सरकार का कोई बोर्ड हो, विशेषज्ञों की मोटी तकनीकी रिपोर्ट हो और इसके बावजूद भी आप तकरार करने की हिमाकत करें, तो या तो आप कतई सिरफिरे हैं या निश्चित तौर पर माओवादी हो सकते हैं। जिसके नापाक इरादों पर पानी फेरने के लिए भारत सरकार चौबीसों घंटे चौकन्नी व लामबंद है।

इन दिनों उत्तराखंड मुआवजे की धनराशि से खरीदी गई गाड़ियों, उन पर लगे भारत सरकार के बोर्ड और उसमें विराजमान ताजी हजामत वाले, कृत्रिम इत्र-फुलेल की दुर्गंध छोड़ते भाड़े के विशेषज्ञों और उनके काणे विज्ञान की कलाबाजियों से पूरी तरह सम्मोहित है। मदारी, बहरूपिए, चालबाज, जेबकतरे आदि जब बड़े स्तर पर हाथ मारने में कामयाब हो जाते हैं, तो अंग्रेजी में उन्हें कलाकार का दर्जा देते हुए कॉन आर्टिस्ट कहा जाता है। उत्तराखंड में बड़े कॉन आर्टिस्टों की क्षमता संपन्न कंपनियों द्वारा कथित विशेषज्ञों को भाड़े पर उठाकर जो मायाजाल बुना जा रहा है, वह शेयर बाजार में भले ही उफान पैदा कर दे, स्थानीय आजीविका और अस्तित्व पर तो वह अंतिम कील ठोक ही देगा। इस भ्रम का शीघ्र अति शीघ्र पर्दाफ़ाश करना संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई का हिस्सा बनता जा रहा है।


जब किसी के नाम के आगे विशेषज्ञ शब्द जुड़ जाए और ऊपर भारत सरकार का बोर्ड हो तो किसी की क्या मजाल कि उसकी विशेषज्ञता को चुनौती दे सके। फिर मामला जब ऐसा हो कि विशेषज्ञ की जरूरत पहले से तैयार रिपोर्ट के अंत में सिर्फ हस्ताक्षर भर करने के लिए हो, तो लाला किसी भी अंजे-गंजे को विशेषज्ञ के स्थान पर खड़ा कर देगा। जैसे वर्ष 2003 में विख्यात पर्वतारोही हरीश कपाड़िया जल्दबाजी में ग्लेशियोलॉजी पढ़ने वाले एक लौंडे को विशेषज्ञ बनाकर विश्व धरोहर नंदादेवी कोर जोन में ले गए, तो पूरी सरकार उनकी आवभगत में जुटी रही। सामाजिक-आर्थिक स्तर पर विशेषज्ञता का बंटाधार तो डा।राबर्ट चैंबर्स अपने पी।आर।ए। और आर।आर।ए।के कथित विज्ञान द्वारा पहले ही कर चुके थे।

आप दो हफ्ते के 70-72 घंटे के प्रशिक्षण द्वारा डॉक्टर, इंजीनियर या फॉरेस्टर नहीं बन सकते परंतु इतने ही समय में कोई भी लप्पू झन्ना न केवल समाजशास्त्री बन सकता है बल्कि अपने तूफानी दौरे के दौरान होटल-ढ़ाबों में हुई बातचीत के बल पर नीतिगत अनुशंसा करने के स्तर तक भी पहुंच जाता है। बहुत संभव है कि डा.चैंबसरा की यह मंशा न रही हो पर उनके पी.आर.ए.शास्त्र ने लालाओं के "उत्तराखंड कब्जाओ" एजेंडा को बल ही प्रदान किया है। बांध संबंधी विषयों पर जनता के साथ बैठकों की संचालन विधि, चांदी के कटोरों की भेंट और जन सुनवाइयों की हलवा-पूरी की कवायद उस दौर से बिल्कुल अलग नहीं, जब नकली मोती और आईना देकर अंग्रेज आदिवासियों की जमीनें हड़पा करते थे। इतना जरूर है कि तब नेतृत्व दलाल नहीं अपितु भोला था। पी।आर।ए।ने हमारे माननीय प्रशासकों के दृष्टिकोंण को ठीक उसी सांचे में ढालने में भूमिका निभाई हो, जो साम्राज्यवाद के विस्तार के दौर में क्षेत्रीय प्रशासकों का होता था। आज का प्रशासक उससे भी ज्यादा क्षमता संपन्न है, वह अपने पी।आर।ए। द्वारा लोकतंत्र के बाकी बचे स्तंभों को चलाता है।

उत्तराखंड निर्माण के उपरांत जिस धंधे के दिन पलटे उसमें विशेषकर डी.पी.आर.(डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) बनाने के व्यवसाय से जुड़ा पेशा शामिल है। इसमें भू-वैज्ञानिक, कथित समाजशास्त्री, पर्यावरणीय प्रभाव की रिपोर्ट बनाने वाले किसी भी पृष्ठभूमि के कंसल्टेंट अथवा भाड़े के विशेषज्ञ शामिल होते हैं, जो लालाओं की कंपनी के दिशा निर्देशानुसार रिपोर्ट बनाते हैं। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि जरूरत इनके कथित ज्ञान की नहीं सिर्फ हस्ताक्षरों की होती है, कोई मना कर भी दे, तो बाजार में इनकी कमी नहीं।

उत्तराखंड निर्माण से पूर्व डी।पी।आर।का धंधा अपेक्षाकृत छोटे स्तर पर हुआ करता था, जिस पर देहरादून के मुट्ठी भर भू-वैज्ञानिकों की इजारेदारी थी, जो बेरोजगार भू-वैज्ञनिकों को अल्प समय के लिए भाड़े पर रखकर सीमित मुनाफे में अपनी आजीविका चलाते थे। राज्य निर्माण के उपरांत उत्तराखंड के जल स्रोतों के दोहन के अभियान में आई तेजी ने इनके भी दिन फेर दिए, जो कि निश्चित रूप से बुरी बात नहीं है। मुद्दा रिपोर्टों की और भू-विज्ञान की वैज्ञानिक विश्वसनीयता का है। भू-विज्ञान स्वयं में आधारभूत (फंडामेंटल) विज्ञान न होकर विभिन्न आधारभूत विज्ञानों व एप्लाइड साइंस का अद्भुत सम्मिश्रण है। इसकी नितांत आवश्यकता भी है। तभी तो 1767 में सर्वे ऑफ इंडिया की स्थापना के उपरांत ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1836 में कोल कमेटी का गठन किया, जो कालांतर में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया बनी। साम्राज्यवाद को अपने विस्तार के लिए जिन विभागों की आवश्यकता थी, उनमें भूगोल और भू-विज्ञान प्रमुख थे। पिछली दो शताब्दियों में भू-विज्ञान ने भले ही चहुमुंखी प्रगति कर भी ली हो परंतु वह आधारभूत विज्ञान की तरह दो और दो चार कह पाने की स्थिति में नहीं पहुंचा है। जैसे कि चांई का मामला। अब जे।पी।के सीमेंट से बनी जे।पी।हाईड्रो पावर की टनल यदि रिक्टर 8 के पैमाने के भूकंप को झेल जाएगी, तो इसका श्रेय सीमेंट, सरिया और रेत को सही अनुपात में मिलाने को जाएगा पर ग्राम चांई जो ध्वस्त हुआ तो उस भू-विज्ञान को कौन शूली चढ़ाएगा, जिसके आधार पर उक्त योजना को स्वीकृति प्रदान की गई? जाहिर है कि यह जनता के पैसे पर भू-वैज्ञानिकों के अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार को आयोजित करने का अच्छा बहाना हो सकता है। जिसमें विभिन्न प्रकार के कयास लगाए जाएंगे पर चांई के साथ हुए विश्वासघात पर चर्चा नहीं होगी क्योंकि यह भू-विज्ञान का विषय जो नहीं है।

चांई एक छोटा गांव है, जो भाड़े के विशेषज्ञों की बलि चढ़ गया। अब जोशीमठ के अस्तित्व पर तलवार लटक गई है, जो बदरीनाथ जी का शीतकालीन आवास और संभवत: लाखों परिवारों की आजीविका का स्रोत है। जिसके ऊपर अरबों रुपयों के शीतकालीन क्रीड़ा की इंवेस्टमेंट भी हैं। इधर, एन.टी.पी.सी.का एफ.पी.ओ.शेयर बाजार में उतरा रहा है। उधर, जोशीमठ के ठीक नीचे कहीं जल रिसाव से सुरंग का कार्य बंद हो गया। अब बाजार से पैसा उठाना परियोजना की गुणवत्ता से महत्वपूर्ण हो गया है। मामला फिर विशेषज्ञों के पाले में है, जो भाड़े पर हैं। जिनका विज्ञान अंत में मात्र कयासों पर आधारित है। कल यदि जोशीमठ के अस्तित्व को कुछ होता है, तो जनता संभवत: ये कैसे हुआ होगा इस विषय पर भूगर्भ शास्त्रियों की थ्योरियां न सुनना चाहेगी बल्कि आज अपने अस्तित्व की गारंटी लेना पसंद करेगी।

ऊर्जा निश्चित रूप से देश की आवश्यकता है। हैरत की बात है कि ओ.एन.जी.सी.के भूगर्भशास्त्री दशकों भारत में तेल खोजते रहे पर मिला खुलेपन के उपरांत रिलायंस घराने को। जिसकी बंदरबांट का झगड़ा इस देश का सबसे चर्चित अदालती केस है। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में कहें, तो यहां पर्यावरणवादियों और जल ऊर्जा कंपनियों ने अपने-अपने इलाके कब्जा लिए हैं। बांध के मामले में पर्यावरणवादी भी चुप्पी साध लेते हैं। इस दोहरी मार का एक उदाहरण जोशीमठ-मलारी के बीच स्थित ग्राम लाता है, जहां भारत के वन्य जीव संस्थान के विशेषज्ञों ने अपने कथित अध्ययनों के आधार पर जनता पर अनेक प्रतिबंध लगा दिए पर उसी ग्राम की तलहटी पर बन रहे बांध के पर्यावरणीय प्रभाव पर ये विशेषज्ञ मौन हैं। इन बांधों की डी।पी।आर।में इस क्षेत्र का कोई जैव विविधीय महत्व नहीं है। कोई बड़ी बात नहीं कि इन परियोजनाओं की पर्यावरणीय समीक्षा भी इन्हीं विशेषज्ञों अथवा इनके चेलों ने तैयार की हों।

विभिन्न राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पर्यावरण व जैव विविधता का रोना रोने वाले ये विशेषज्ञ आज मौन क्यों हैं? इस पर चर्चा करना व्यर्थ है। ऊर्जा की आवश्यकता और जैव विविधता संरक्षण, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे हैं, जबकि स्थानीय जनता का अस्तित्व, स्थानीय मुद्दा। उत्तराखंड की राजनीति यदि ठेकेदारी पर आश्रित न होती, तो संभवत: भाड़े के विशेषज्ञों द्वारा रचे गए इस मारक चक्रव्यूह से जनता को सुरक्षित बाहर निकाल लाती।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

शेर की जगह मेरा शिकार


रस्किन बॉंड
अकसर कहा जाता है कि महिलाएं अच्छी ड्राइवर नहीं हो सकतीं, लेकिन मेरी राय कुछ भिन्न है। श्रीमती बिश्वास बहुत कमाल की ड्राइवर थीं, लेकिन बड़ी खतरनाक भी थीं। उनके पति बहुत जाने-माने शिकारी थे। सप्ताह के आखिरी दिन श्रीमती बिश्वास अकसर लैंडूर के अपने समर होम में बिताया करती थीं। मैं उनकी एक-दो पार्टियों में गया, जहां अकसर मर्दो का ही जमावड़ा हुआ करता था।

सड़कों पर मेरी जितनी तरह के रोचक और मजेदार लोगों से मुलाकात हुई है, उसका मुकाबला सिर्फ उन निहायत ही दिलचस्प ड्राइवरों से किया जा सकता है, जो मुझे लेकर आते-जाते थे। आखिरी बार मुझे लेकर आने वाला ड्राइवर क्वालिस गाड़ी चला रहा था। उसका सबसे बड़ा सपना पायलट बनना था और वह सड़क पर ऐसे गाड़ी चला रहा था, मानो वह कोई रन-वे हो। वह लगातार बिल्कुल अब गिरा कि तब गिरा वाली हालत में किनारे पर जा पहुंचता था।

पैदल चलने वाले, साइकिल चालक और ऐसे ही छोटी-छोटी गाड़ियां चलाने वाले लोग दाहिनी और बाईं ओर बिखरे हुए थे और अकसर मेरे ड्राइवर को देखकर कुछ-कुछ बड़बड़ाते रहते थे। ड्राइवर उन तमाम रंग-बिरंगी तरह-तरह की गालियों और तानों के प्रति बड़ा सहज मालूम दे रहा था। ट्रक ने जाने का रास्ता नहीं दिया, लेकिन वह बड़े आराम से ट्रक के पीछे-पीछे लगा रहा। उल्टे-सीधे, टेढ़े-मेढ़े रास्तों से होकर जितना संभव हो, उतने कम से कम समय में वह दिल्ली से देहरादून पहुंच जाना चाहता था।

‘कोई जल्दी नहीं है,’ मैंने एकाधिक बार उससे कहा, लेकिन उसे अंग्रेजी कम ही आती थी। बाद में उसने बताया कि उसे लगा कि मैं कह रहा हूं, ‘जरा जल्दी करो।’ बहरहाल वह फर्राटे से चलता रहा और तब तक गाड़ी भगाता रहा, जब तक कि एक रेलवे फाटक ने हमें रुकने के लिए मजबूर नहीं कर दिया। एक स्कूटर सवार बिल्कुल बगल में आया और ड्राइवर को पुलिस में देने की धमकी देने लगा। इसके बाद लंबी और गर्मागर्म बहस का सिलसिला शुरू हुआ। लगा कि अब नौबत मारा-मारी पर उतर आएगी, लेकिन तभी रेलवे का फाटक खुल गया और क्वालिस बुत बने उस स्कूटर सवार को पीछे छोड़कर फर्राटे से आगे बढ़ गई।

चूंकि मैं खुद गाड़ी नहीं चलाता, इसलिए आमतौर पर आगे की सीट पर बैठने के लिए सबसे सही व्यक्ति हूं। मैं अपने सारे भरोसे का भार स्टीयरिंग के पीछे बैठे हुए आदमी पर डाल देता हूं। आगे बैठने से मुझे सड़क और गुजरते हुए पेड़ों का नजारा देखने में आसानी होती है। मसूरी के सबसे बेहतरीन ड्राइवरों में से एक है मनमोहन, जो अपनी टैक्सी चलाता है। जंगली जानवरों और जंगल के जीवन के प्रति उसका आकर्षण और उत्साह भी बहुत जबर्दस्त है।

मुझे हमेशा आश्चर्य होता है कि वह कैसे शिवालिक की पहाड़ियों और तीखे घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर गाड़ी चलाता है, लेकिन इसके बावजूद चारों ओर फैले हुए जंगलों पर भी उसकी नजर चली जाती है। ‘अरे वो देखिए चीतल,’ वो उत्साह से चीखकर बोलेगा, या ‘क्या शानदार सांभर है?’ या ‘जरा उस हाथी को देखिए।’ ये सब वह बहुत तेज गति से गाड़ी चलाते हुए बोलता जाता है। इससे पहले कि मुझे एक या दो जानवरों पर उड़ती-उड़ती सी नजरें घुमाने का मौका मिले या उसकी एक झलक पा लेने का, हम उस जगह को पार कर चुके होते हैं। कोई भी आराम से गाड़ी नहीं चलाता है।

मनमोहन कसम खाकर कहता है कि मोहंद के पास सड़क पार करते हुए उसने एक बाघ देखा था। वह बहुत दृढ़ उसूलों वाला व्यक्ति है, इसलिए मुझे उसकी बात पर यकीन करना पड़ता है। मुझे लगता है कि बाघ खासतौर से मनमोहन के लिए ही आता है। जंगल के दूसरे दीवाने स्टेट बैंक के नाम से ख्यात मेरे दोस्त विशाल ओहरी हैं। वे मुझे हरिद्वार और मोहंद के बीच एक जंगल में ले गए। वहां हमने चीतल और जंगली सूअर से लेकर कई सारे जानवर देखे। दूसरे टैक्सी ड्राइवरों के ठीक उलट उन्हें मंजिल तक पहुंचने की कोई जल्दी नहीं थी और वे जब देखो तब हाथियों के पैरों के निशान देखने-जांचने के लिए यहां-वहां रुक जाते थे।

उन्होंने वहां पड़े हुए हाथी के ताजा गोबर की ओर भी इशारा किया। यह इस बात का प्रमाण था कि जंगली हाथी वहां कहीं आसपास ही है। मुझे यकीन नहीं था कि उनकी पुरानी फिएट गुस्सैल जंगली हाथी का मुकाबला कर पाएगी। इसलिए मैंने उनसे गुजारिश की कि रात होने से पहले ही वहां से निकल चलें। तब वे हाथी के गोबर के फायदों को लेकर शुरू हो गए कि कैसे कच्ची दीवार को मजबूत बनाने के लिए इस गोबर का इस्तेमाल किया जा सकता है। विशाल अपने समय से बहुत आगे था। अभी कुछ ही दिन पहले मैंने एक अखबार में पढ़ा कि हाथी के गोबर से बहुत उम्दा क्वालिटी का कागज बनाया जा सकता है। संभवत: वे बैंक के नोट बनाने के लिए उसका इस्तेमाल करेंगे।

कई और भी शानदार ड्राइवर हैं, जो मुझे यहां-वहां लेकर जाते रहते हैं। उनमें गणोश सैली भी शामिल है, जो एक-दो पैग चढ़ाने के बाद भी बिल्कुल सामान्य रहता है। निक्टर बनर्जी, जो बिना पिए ही ज्यादा ठीक रहता है और युवा गुरदीप, जो केनी बी के सेक्सोफोन का दीवाना है। गुरदीप के साथ दिल्ली जाते हुए रास्ते में मुझे छह घंटे केनी बी का सेक्सोफोन सुनना पड़ा। अभी दो दिन पहले वहां से लौटते हुए फिर से छह घंटे केनी बी को झेलता रहा। अब तो जब भी सेक्सोफोन की आवाज कान में चली जाए तो मैं बावला होने लगता हूं।

अकसर कहा जाता है कि महिलाएं अच्छी ड्राइवर नहीं हो सकती हैं, लेकिन मेरी राय कुछ भिन्न है। श्रीमती बिश्वास बहुत कमाल की ड्राइवर थीं, लेकिन बड़ी खतरनाक भी थीं। उनके पति बहुत जाने-माने शिकारी थे और दिल्ली के अपने फार्म हाउस के ड्रॉइंग रूम में भुस भरी हुई चीते की खाल रखते थे। सप्ताह के आखिरी दिन श्रीमती बिश्वास अकसर लैंडूर के अपने समर होम में बिताया करती थीं। मैं उनकी एक-दो पार्टियों में गया था, जहां अकसर मर्दो का ही जमावड़ा हुआ करता था। एक दिन जब मैं सड़क पर जा रहा था, वह मेरे बगल से गाड़ी से गुजरीं और पूछा कि क्या मैं नीचे देहरादून तक उनका साथ देना पसंद करूंगा। ‘मैं आपके साथ चलूंगा,’ मैंने जवाब दिया। ‘क्वालिटी में हम बढ़िया खाना खा सकते हैं।’ इस तरह हम पहाड़ी से नीचे गए। श्रीमती बिश्वास ने कुछ खरीदारी की और हमने क्वालिटी में लंच किया और उनकी गाड़ी में वापस आए और चलने को हुए, लेकिन मसूरी और लैंडूर की उल्टी दिशा में। ‘हम कहां जा रहे हैं?’ मैंने पूछा।

‘दिल्ली और कहां? क्या आप मेरे साथ नहीं चल रहे।’

‘मुझे पता नहीं था कि हम दिल्ली जा रहे हैं। मेरे पास पैजामा भी नहीं है।’ ‘कोई बात नहीं,’ श्रीमती बिश्वास बोलीं, ‘मेरे पति का आपको फिट आएगा।’

मैंने विरोध किया, ‘हो सकता है कि वो मुझे अपना पैजामा पहनने के लिए न देना चाहें।’ ‘अरे फिक्र मत करो, अभी वो लैंडूर में हैं।’ मैंने श्रीमती बिश्वास से नजदीक के बस स्टॉप पर मुझे उतार देने की जिद की, उनसे विदा ली और वापस मसूरी की बस पर सवार हो गया। हो सकता है कि वो अच्छी ड्राइवर हों, लेकिन मेरा कोई इरादा नहीं था कि मैं भी उनके ड्रॉइंग रूम में भुस भरे चीते के बगल में भुस भरकर लटका हुआ पाया जाऊं।

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

संतों के अखाड़े: परंपरा और विवाद


शालिनी जोशी
आम तौर पर 'अखाड़ा' शब्द सुनते ही पहलवानी और कुश्ती का ध्यान आता है लेकिन हरिद्वार के महाकुंभ में साधु-संतों के कई अखाड़े है. ज़ोर-आज़माइश तो यहाँ भी है, लेकिन धार्मिक वर्चस्व के लिए. शाही सवारी रथ, हाथी-घोड़े की सजावट, घंटा-बाजे, नागा-अखाड़ों के करतब और यहाँ तक कि तलवार और बंदूक तक के प्रदर्शन...हरिद्वार में इन दिनों साधु-संतों के अखाड़ों की धूम है. अखाड़ों के शिविर लग रहे हैं.

अखाड़े एक तरह से हिंदू धर्म के मठ कहे जा सकते हैं. आदि शंकराचार्य ने सदियों पहले बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रसार को रोकने के लिए अखाड़ों की स्थापना की थी. महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव महंत रवींद्रपुरी दास कहते हैं, ''जो शास्त्र से नहीं माने उन्हें शस्त्र से मनाया गया और अखाड़ों ने हिंदू धर्म का पुनरुत्थान किया.''
उनके अनुसार शुरु में केवल चार प्रमुख अखाड़े थे, लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उनका बंटवारा होता गया और आज 13 प्रमुख अखाड़े हैं। कुंभ अखाड़ों का ही है .कुंभ ऐसा अवसर है जहाँ आध्यात्मिक और धार्मिक विचार-विमर्श होता है. अखाड़े अपनी-अपनी परंपराओं में शिष्यों को दीक्षित करते हैं और उन्हें उपाधि देते हैं
अखाड़ा परिषद के महंत ज्ञानदास कहते हैं,''दरअसल कुंभ अखाड़ों का ही है. कुंभ ऐसा अवसर है जहाँ आध्यात्मिक और धार्मिक विचार-विमर्श होता है. अखाड़े अपनी-अपनी परंपराओं में शिष्यों को दीक्षित करते हैं और उन्हें उपाधि देते हैं.''

श्रद्धालु जहाँ पुण्य कमाने की इच्छा लिए हर की पैड़ी पहुँचते हैं, वहीं साधु-संतों का दावा है कि वे कुंभ पहुंचते हैं गंगा को निर्मल करने के लिए. महंत पूर्णानंदगिरी का मानना है, ''गंगा धरती पर उतरने के लिए तैयार नहीं थीं कि धरती पर बहुत पाप हैं, तब उन्हें समझाया गया कि कुंभ में साधु–संत आकर अपने ज्ञान और स्नान से आपके पाप धोएँगे.''
दिलचस्प बात यह है कि इन अखाड़ों में टीवी पर लोकप्रिय साधु-संतों की कोई पूछ नहीं है. अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञानदास कहते हैं, ''आसाराम हों या मोरारी बापू या स्वामी रामदेव. सभी का अपना-अपना व्यवसाय है. हम इन्हें संत नहीं मानते हैं.'' हालांकि कुंभ में स्नान को लेकर इन अखाड़ों में ख़ुद भी हमेशा से झगड़े होते आए हैं.
इन जगड़ों का कारण पूछने पर पंडित प्रतीक मिश्र बताते हैं, ''मान्यता है कि ब्रह्मकुंड में पहले जो स्नान करेगा उसे ज़्यादा पुण्य मिलेगा, इसलिए साधुओं में पहला स्नान करने और स्नान के क्रम को लेकर खूनी संघर्ष तक हुए हैं. इन संघर्षों में अबतक हज़ारों साधुओं की मौत हो चुकी है.'' हरिद्वार में चल रहे महाकुंभ में तीन शाही स्नान होंगे. इनमें से पहला आज यानी 12 फ़रवरी को है।
हरिद्वार महाकुंभ में कई दशकों बाद ऐसा लग रहा था कि साधुओं में स्नान को लेकर सहमति बन गई है लेकिन अचानक ही छह अखाड़ों ने चेतावनी दे दी है. उनकी माँग है कि बैरागी, उदासी और निर्मल अखाड़ों के कुंभ स्नान को भी शाही स्नान का दर्जा दिया जाए और अगर ऐसा नहीं हुआ तो सभी कुंभ स्नानों का बहिष्कार किया जाएगा. फ़िलहाल ये प्रस्ताव शासन के पास विचाराधीन है. ( बीबीसी से साभार)

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

बाबा,बमबम और बंदूक


कुंभ मेले में सुदूर हिमालय की कंधराओं से आए नागा साधु सबसे अलग ही नजर आ रहे हैं। हाथ में सिमटा,त्रिसूल और बंदूक थामें इन नागा बाबाओं की रहस्यमयी दुनिया को जानने के लिए हर कोई लालायित है। नागा साधुओं के बारे में कहा जाता है कि ये सिर्फ कुंभ मेले ही दिखाई देते हैं। मेले के बाद कहां जाते हैं और कहां रहते हैं कोई नहीं जानता। इनके रहने के ज्यादातर ठिकाने उत्तराखंड की पर्वतमालाएं हैं। नागा साधु किसी भी अखाड़े में आ जा सकते हैं। इनके हाथों में हथियार हिंदू धर्म की सुरक्षा का प्रतीक है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भले ही हम चांद पर पानी और मंगल पर जीवन खोजने का दावा कर रहे हों लेकिन नागा साधुओं की निराली दुनिया का रहस्य आज भी पहेली बना हुआ है।