सोमवार, 17 मई 2010

मेरे घर के मेहमान

रस्किन बॉन्ड
जब हिमालय की वादियों में कोहरा उतरता है और मानसून की बारिश पहाड़ियों को भिगो देती है, तो यह लाजिमी ही है कि जंगली पशु, पक्षी, कीट-पतंगे सिर छुपाने के लिए किसी आसरे की तलाश में निकल पड़ें। तूफान आने की स्थिति में तो किसी भी जगह से उनका काम चल जाता है।

कई बार तो जंगल में मौजूद मेरा कॉटेज भी इन वन्यजीवों के लिए सबसे आरामदेह पनाहगाह बन जाता है। हालांकि इसमें शक नहीं कि मैं भी अपने कॉटेज की तमाम खिड़कियां खुली छोड़कर भीतर आने में उनकी मदद ही करता हूं। मैं उन लोगों में से हूं, जिन्हें अपने घर में खूब सारी ताजा हवा अच्छी लगती है और यदि हवा के साथ कुछ परिंदे, वन्यजीव या कीड़े-मकोड़े भी भीतर चले आएं तो मुझे कोई हर्ज नहीं। बशर्ते वे मुझे बहुत ज्यादा तकलीफ में न डालें।

लेकिन मैं स्वीकार करता हूं कि पिछली रात एक गुबरैले के कारण मेरा धीरज जवाब दे गया। वह गुबरैला सीधे मेरे पानी के जग में आ गिरा था। मैंने उसे उठाया और खिड़की से बाहर फेंक दिया। लेकिन चंद सेकंडों बाद वह फिर भुनभुनाता हुआ मेरे कमरे में आ गया और छपाक से उसी जग में जा गिरा। मैंने उसे एक दफा फिर बाहर निकाला और रात की आजादी का लुत्फ उठाने के लिए बाहर छोड़ दिया। लेकिन उसे मेरे कमरे की रोशनी और गर्माहट ज्यादा लुभा रही थी, इसलिए वह फिर भीतर आ गया और किसी हेलीकॉप्टर की तरह कमरे में चक्कर काटने लगा। वह नीचे उतरने के लिए कोई उचित जगह तलाश रहा था। मैंने जल्दी से अपने पानी के जग को ढंक दिया। आखिरकार वह जंगली डेहलिया के फूलों से भरे एक मर्तबान में जा गिरा। इस दफा मैंने उसे नहीं छेड़ा। अब वह फूलों की नर्म बिसात पर आराम फरमा सकता था।

कभी-कभी दिन के समय एक नन्हा सा परिंदा मेरे घर आ जाता है। यह गाढ़े जामुनी रंग की सारिका है, जो दाएं-बाएं फुदकती रहती है। लेकिन मेरे घर में शायद वह इतनी घबराई हुई होती है कि वह कुछ नहीं गाती। वह खिड़की के नीचे अपना बसेरा बना लेती है और बाहर बारिश को निहारती रहती है। लेकिन उसे ज्यादा नजदीकी पसंद नहीं। मैं इधर अपनी कुर्सी पर चुपचाप बैठा रहता हूं और उधर वह चिड़िया खिड़की पर बैठी रहती है। कभी-कभी वह सिर घुमाकर मेरी तरफ देख लेती है कि कहीं मैं उसके करीब आने की कोशिश तो नहीं कर रहा। बारिश थमने पर वह बाहर उड़ जाती है। बाहर जाकर ही उसका आत्मविश्वास लौट पाता है और वह गाना शुरू कर देती है। बीच-बीच में टूटता हुआ मीठा स्वर, जो वादी में गूंजता रहता है और जिसे आप कभी नहीं भूल सकते।

कभी-कभी एक गिलहरी चली आती है। खास तौर पर तब जब बलूत के पेड़ पर उसके कोटर में पानी घुस आता है। वो मुझे भली तरह पहचानती है और खाने के टुकड़ों की तलाश में बेधड़क मेरे खाने की टेबल तक चली आती है। मैं जानबूझकर उसके लिए वहां कुछ निवाले छोड़ देता हूं। अगर वह मुझसे थोड़ा और पहले मिली होती तो मैं उसे अभी तक अपने हाथों से खाना सिखा चुका होता। मुझे यह सब भाता है। मुझे पालतू जानवरों की जरूरत महसूस नहीं होती। मेरे लिए मेरे ये मेहमान ही काफी हैं।

पिछले हफ्ते जब मैं अपनी डेस्क पर बैठा एक लंबा लेख लिख रहा था, तब अचानक हल्के हरे रंग के एक टिड्डे को अपने पैड पर बैठा देख मैं चौंक गया। हम दोनों एक-दूसरे को ताकते रहे। जब मैंने उसे हल्के से धकियाया तो वह धीमे से वहां से जाने लगा। बाद में मैंने उसे विटमैन की लीव्ज ऑफ ग्रास की जिल्द का मुआयना करते हुए पाया। उसके बाद वह दो दिन तक नजर नहीं आया। दो दिन बाद वह मुझे अपनी ड्रेसिंग टेबल पर नजर आया, जहां वह खुद को एक आईने में निहार रहा था। लेकिन शायद मैं गलत हूं। वह खुद को निहार नहीं रहा था, शायद उसे लगा हो कि वहां एक और टिड्डा है और वह उससे जान-पहचान करने की कोशिश कर रहा हो।

उसके बाद मुझे अपने बगीचे में एक और टिड्डा नजर आया। वह जास्मीन की झाड़ियों में बैठा हुआ था। उसकी बाहें किसी मुक्केबाज की तरह खुली हुई थीं। मुझे लगा वह मेरे घर वाले टिड्डे को बुला रहा है। मैं भीतर गया और टिड्डे को ले आया। मैंने दोनों को साथ-साथ रख दिया। लेकिन यह क्या, उसे तो इस बगीचे वाले टिड्डे की शक्ल ही पसंद नहीं आई और वह वहां से भाग खड़ा हुआ। आईने में उसने अपनी जो शक्ल देखी थी, आखिर उससे इसकी तुलना कहां?

लेकिन मेरा सबसे दिलचस्प मेहमान रातों को आता है। और वह है एक नन्हा चमगादड़। वह कभी दरवाजे से तो कभी खिड़की से भीतर चला आता है। मैंने आज तक जितने भी चमगादड़ देखे, वे सभी ऊपर छत से लगभग सटकर उड़ते हैं। लेकिन यह नन्हा चमगादड़ काफी नीचे उड़ता है, जैसे कोई बमवर्षक विमान हो। वह मेरे फर्नीचर के नीचे तक पहुंच जाता है और कभी टेबल की टांगों के इर्द-गिर्द यहां-वहां टकराता हुआ उड़ता रहता है। एक बार तो ऐसा भी हुआ कि वह मेरे कमरे में डगमगाते हुए उड़ता रहा और फिर मेरी टांगों के बीच से निकल गया!

मैंने सोचा क्या उसका रडार काम नहीं कर रहा है या वह कोई सिरफिरा चमगादड़ है? मैंने अपनी किताबों की अलमारी में प्राकृतिक इतिहास की किताबें टटोलीं और चमगादड़ों की किस्मों के बारे में जानने की कोशिश की, लेकिन मुझे इस तरह का कोई उदाहरण नहीं मिला। आखिरकार मैंने एक काफी पुरानी किताब (वर्ष 1884 में कलकत्ता से छपी स्टर्नडेल की किताब इंडियन मैमालिया) की शरण ली। और मेरी खुशी का तब कोई ठिकाना नहीं रहा, जब मुझे वहां वह चीज मिल गई, जिसकी मैं तलाश कर रहा था। किताब में साफ-साफ लिखा था कि कैप्टन हटन को मसूरी के नजदीक दक्षिणी श्रंखला पर 5500 फीट ऊंचाई पर ऐसा चमगादड़ मिला था, जो ऊंचे उड़ने की बजाय काफी नीचे उड़ा करता था। यह चमगादड़ महज 1.4 इंच का था और सामान्यत: हिमालय के दक्षिण पश्चिम में स्थित झरीपानी में पाया जाता था। वर्ष 1884 में भी इस किस्म का चमगादड़ काफी दुर्लभ ही हुआ करता था।

शायद मेरी मुठभेड़ इस प्रजाति के कुछ दुर्लभ जीवित बचे सदस्यों में से किसी एक से हो गई थी। जहां मैं रहता हूं, वहां से झरीपानी महज दो मील दूर है। मुझे खासा अफसोस हुआ कि आधुनिक प्राणीविज्ञानियों ने इस नन्हे चमगादड़ की प्रजाति पर कोई ध्यान ही नहीं दिया। शायद उन्हें ये लगता है कि इस तरह की प्रजाति पहले ही विलुप्त हो चुकी है। यदि ऐसा है तो मुझे बेहद खुशी है कि मैंने उनमें से एक को ढूंढ़ निकाला। मैं खुश हूं उसे मेरे छोटे-से घर में सिर छुपाने लायक जगह मिल जाती है और मुझे भी उसके बारे में कविता या गद्य में कुछ न कुछ लिखने का मौका मिल जाता है।

लेखक पद्मश्री से सम्मानित ब्रिटिश मूल के साहित्यकार हैं।

सोमवार, 10 मई 2010

क्या सोचते होंगे पहाड़?

विनोद भारद्वाज

सुबह-सुबह शिमला से निकलकर कुफ्री व फागू के घुमावदार रास्तों पर टैक्सी चलाते मंगतराम के मन में पहाड़ों के बदलते हालात को लेकर जो भाव आ रहे थे, शायद वह उन्हें मुझसे बांटना चाह रहा था। आखिर एक बेहद हरीभरी घाटी के पास गाड़ी रोककर उसने जब यह बताया कि इससे ज्यादा घनी व सुरम्य घाटी आपको हिमाचल में शायद ही देखने को मिले, तो लगा कि उसे अपनी इस धरोहर पर तो गर्व है, लेकिन इस बात की पीड़ा भी है कि पहाड़ के अन्य हिस्सों की सघनता व हरियाली अब अपना स्वरूप खोती जा रही है। वास्तव में उस घाटी को देखकर मुझे भी लगा कि जब मेजर सर विलियम लायड शिमला में भवन बनाने के लिए जमीन का जायजा ले रहे थे तो उन्होंने ठीक ही टिप्पणी की थी कि पहाड़ की हवा एक तेज की तरह मेरी धमनियों में समा गई, जिससे मुझे लगा कि मैं सबसे गहरी संकरी घाटी में कुलांचे भर सकता हूं अथवा उतनी ही आसानी से पहाड़ के दुरारोह छोरों तक फुर्ती से उछलता जा सकता हूं... आज का दिन मैं कभी नहीं भूलूंगा।



घाटी के उस मोह से निकलकर जब हम फागू की तरफ बढ़े तो पहाड़ों की बदहाली पर मंगतराम लगातार बोलता रहा। अंग्रेजों का जमाना देख चुके उन हिंदुस्तानियों की तरह वह भी अंग्रेजी राज का प्रशंसक लगा जो मानते हैं कि स्वराज तो आया पर सुराज की जगह हमारे लोकतंत्र ने अराजकता को ही जन्म दिया। इसलिए लोकराज से तो अंग्रेजों का राज ठीक था। मंगतराम को इस मुद्दे पर जब मेरा कोई साथ नहीं मिला तो वह उन इमारतों, पुलों व सड़कों के बारे में बताने लगा जो अंग्रेजों ने सौ साल से अधिक समय पहले बनवाए थे और ऐसे निर्माण आज भी अपनी आभा व मजबूती के साथ विद्यमान हैं। कुशल कार चालन और अपनी तमाम जानकारियों के साथ जब मंगतराम ने मुझे जाखू की खूबसूरत पहाड़ी पर ले जाकर खड़ा किया तो मानो मन से कई तरह की परतें हटती चली गईं। याद आया कि पंडित नेहरू अक्सर पहाड़ों के बारे में कहा करते थे कि मेरी आंखों के सामने सदैव पहाड़ों का दृश्य घूमता रहता है और वहां के खतरे भी सुहाने लगते हैं। मेरा हृदय सदैव उन शांत हिमकणों के लिए तरसता रहता है।

पहाड़ों के मौन पत्थरों की भाषा पढ़कर ही नेहरू ने कभी सन उन्नीस सौ पैंतीस में अपने एक लेख में यह भी लिखा था कि इन पत्थरों ने अपनी लंबी जिंदगी में न जाने कितनी बातें देखीं। इनके सामने बड़े-बड़े साम्राज्य गिरे, पुरानी सल्तनतों का नाश हुआ, धार्मिक परिवर्तन हुए। खामोशी से इन पहाड़ों ने यह सब देखा और हर क्रांति और बदलाव पर उसने अपनी भी पोशाक बदली। वर्षों के तूफानों को इन्होंने बर्दाश्त किया, बारिश ने उन्हें धोया, हवा ने अपने बाजुओं से उनको रगड़ा। कभी-कभी मिट्टी ने उनके बहुत से हिस्से को ढंक दिया। फिर भी बुजुर्गी और शान उनके एक-एक हिस्से से टपकती है। मालूम होता है कि उनकी रग-रग और रेशे-रेशे में हजारों वर्षों का तजुरबा भरा पड़ा है।

इतने लंबे समय तक प्रकृति के खेलों और तूफानों को बर्दाश्त करना बेहद कठिन था, लेकिन उससे अधिक कठिन था मनुष्यों की हिमाकतों व लालच को सहना। पर उन्होंने यह सब भी सहा। पहाड़ों के इन पत्थरों की खामोश निगाहों के सामने साम्राज्य खड़े हुए और गिरे, मजहब उठे और बैठे, बड़े से बड़े बादशाह, खूबसूरत से खूबसूरत औरतें, लायक से लायक आदमी चमके और फिर अपना रास्ता नापकर गायब हो गए। हर तरह की वीरता इन पत्थरों ने देखी और देखी हर तरह की नीचता और मनुष्य का कमीनापन। बड़े और छोटे, अच्छे और बुरे सब आए और चल बसे, लेकिन ये पत्थर आज भी कायम हैं। क्या सोचते होंगे ये पत्थर! जब वे आज भी अपनी ऊंचाई से देखते होंगे, बच्चों के खेल, बड़ों की लड़ाई, फरेब और बेवकूफी! हजारों सालों में आदमी ने कितना कम सीखा। कितने और दिन लगेंगे इनको अक्ल और समझ आने में? शायद मंगतराम की भी यही पीड़ा रही हो।

शनिवार, 1 मई 2010

बदल जाएगा एवरेस्ट का इतिहास



दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को क्या तेनजिंग नोर्गे और एडमंड हिलेरी से पहले भी किसी ने फतेह कर लिया था यह सवाल आज भी रहस्य बना हुआ है। लेकिन हो सकता है 2011 में इस रहस्य से पर्दा उठ जाए। अमेरिकी एवरेस्ट रिसर्चर टॉम हॉलज़ेल इस काम को अमलीजामा पहनाने की तैयारी कर रहे हैं। इस काम के लिए वे बाकायदा फंड भी इकट्ठा करने में लगे हैं।
कुछ जानकारों का कहना है कि 8 जून 1924 को 38 वर्षीय जॉर्ज मेलोरी और 22 वर्षीय एंड्र्यू इरविन ने धरती की इस सबसे ऊंची चोटी को फतह कर लिया था। उस दिन मेलोरी और इरविन ने 26000 फीट (8138 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित अपना कैंप छोड़ दिया। बकौल नोएल ओडेल “वे अपनी फतह को लेकर काफी आशान्वित थे लेकिन वे उसके बाद कभी दिखाई नहीं दिए।“ नोएल उस पर्वतारोही दल का हिस्सा थे।
साल 1999 में एवरेस्ट की उत्तरी ढलान पर जॉर्ज मेलोरी का शव खोज लिया गया। कोनार्ड एंकेर और उनके खोजी दल, जो खास तौर पर मेलोरी और इरविन के शवों और उनके साजो-सामान की खोज के लिए बना था, ने एक बड़ी सफलता पाई थी। पड़ताल में मेलोरी के शव के साथ पत्रों का पुलिंदा, कलाई घड़ी, खाने का सामान, पॉकेट नाइफ और गॉगल्स मिले। लेकिन एक खास चीज जो एवरेस्ट के इस सबसे बड़े राज से पर्दा उठा सकती थी वो नहीं मिली, यानी मेलोरी का पॉकेट कोडेक कैमरा इस खोजी दल को नहीं मिल सका। ये भी माना जा रहा है कि उस वक्त शायद वह कैमरा मेलोरी के पास न होकर उनके जूनियर साथी एंड्रयू इरविन के पास रहा हो। गौरतलब है कि इरविन का शव आज तक नहीं मिल सका है।
लेकिन अब इरविन का शव मिलने की आशा बलवती हो रही है क्योंकि अमेरिकी एवरेस्ट रिसर्चर हॉलज़ेल का मानना है कि हाई रेजोल्यूशन एरियल फोटोग्राफी के जरिए उनकी टीम ने इरविन के शव को खोज लिया है। हॉलजेल और उनके पांच अन्य साथियों की द एंड्रयू इरविन सर्च कमेटी ने इरविन के शव को 27641 फीट (8425 मीटर) की ऊंचाई पर लोकेट कर लिया है। अब वे अगले साल यानी 2011 में एक खोजी अभियान चलाने वाले हैं जिसमें उन्हें इरविन का शव और वह कोडेक कैमरा मिलने की पूरी उम्मीद है।
पर्वतारोहियों का मानना है कि कैमरा बर्फ में दफन एवरेस्ट के खोल देगा। दरअसल,1924 में जॉर्ज मेलोरी और इरविन ईस्टमैन कोडेक कैमरा लेकर गए थे। इस कैमरे से खींची गई तस्वीरें ही इस बात का खुलासा कर सकती हैं कि क्या उन दोनों ने एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने में सफलता पा ली थी। हालांकि यह कैमरा अब तक किसी को नहीं मिला है, लेकिन कोडेक के विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कैमरा क्षतिग्रस्त नहीं हुआ होगा तो आज भी उसकी फिल्म से प्रिंट लिए जा सकते हैं चाहे घटना को 9 दशक पूरे होने जा रहे हों।

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

शेखर कपूर, मेलोरी और हिमालय

जयप्रकाश चौकसे

शेखर कपूर ‘पानी’ के पहले ‘मेलोरी’ नामक फिल्म बनाने जा रहे हैं, जो जॉर्ज मेलोरी नामक साहसी अंग्रेज के हिमालय के शिखर पर पहुंचने के असफल प्रयास पर आधारित है। 1924 में मेलोरी और साथी एवरेस्ट शिखर से केवल 800 फीट की दूरी पर थे, जब बुरे मौसम ने उन्हें और साथियों को लील लिया। शायद शेखर कपूर पानी और हिमालय के रिश्ते को जानते हैं, परंतु प्रकृति पर वे कोई फिल्म त्रिवेणी नहीं बनाने जा रहे हैं, जबकि विचार उत्तम हो सकता है। आज पूरी दुनिया की सबसे बड़ी चिंता प्रकृति का संरक्षण है और पानी तथा प्रदूषण इसी व्यापक चिंता का हिस्सा हैं।

संरक्षण का जतन कितना आसान और कठिन भी है, क्योंकि मनुष्य सादगी, किफायत और सदाचार को भूल गया है। क्या हर एक व्यक्ति एक झाड़ लगाकर उसकी सेवा नहीं कर सकता? न जाने यह सरल चीज इतनी कठिन क्यों हो गई है?

बहरहाल शेखर कपूर के साथ जूलिया रॉबर्ट्स भी ‘मेलोरी’ में सहयोगी हैं। उन्हें 1924 में इंग्लैंड के वातावरण को बनाना होगा, जो इसलिए आसान है कि उस देश ने परिवर्तन के साथ अपनी पारंपरिक विरासत को कम से कम एक कोने में संभालकर रखा है। हमारी तरह दूसरे लोग अपनी विरासत के प्रति इतने लापरवाह और उदासीन नहीं हैं। हिमालय अपने आप में अनेक कहानियां समेटे हुए हैं, बल्कि वह स्वयं एक महाकाव्य है।

बर्फ से आच्छादित हिमालय जीवन के रहस्य की तरह अबूझ पहेली है। दुनिया के अन्य इसी तरह के विशाल हिम आच्छादित पहाड़ भी सौंदर्य के धनी हैं, परंतु उनके साथ धार्मिक आख्यान नहीं जुड़े हैं। वैदिक सभ्यता से ही हिमालय के साथ देवी-देवता जुड़े हैं। हमारे अनेक पौराणिक पात्र हिमालय में तप कर चुके हैं। इसी तरह गंगा के साथ जितनी कथाएं जुड़ी हैं, उतनी दुनिया की किसी और नदी के साथ चस्पां नहीं हैं। स्वयं गंगा हिमालय नामक महाकाव्य की ही एक उपकथा है।

मेलोरी अत्यंत साहसी थे। आज हिमालय पर चढ़ने के लिए टेक्नोलॉजी ने अनेक सुविधाएं पैदा कर दी हैं, परंतु मेलोरी के युग में इच्छाशक्ति ही एकमात्र संबल थी। इस फिल्म से जुड़ने के लिए दुनिया का हर काबिल कैमरामैन लालायित होगा, टेक्नोलॉजी ने सिनेमेटोग्राफी को भी आसान कर दिया है।

पच्चीस वर्ष पूर्व कैमरे और लाइट्स का भार उस ऊंचाई तक ले जाना असंभव था। अब सब कुछ आसान है। हिमालय अभियान साहस के साथ अध्यात्म से भी जुड़ा है। उसका सौंदर्य और उसमें अंतर्निहित खतरे आत्मा को पाप मुक्त कर सकते हैं। उसका एकांत कितना रहस्यमय होगा। दरअसल शेखर कपूर से उम्मीद है कि वे इस फिल्म को मात्र साहस कथा के रूप में नहीं प्रस्तुत करते हुए कवि हृदय से प्रस्तुत करें।

संवेदनशील मनुष्य के चिंतन में पहाड़ों और नदियों का गहरा प्रभाव होता है। नदी समय और प्रेम की तरह प्रवाहित है, तो पहाड़ मनुष्य के इरादों की तरह खड़े हैं। याद आती है श्रवण गर्ग की ‘पिता तुम एक पहाड़’ कविता - ‘वह जो पहाड़, तुमने खड़ा किया था, पत्थर के टुकड़ों को अपनी, लगातार जख्मी होती पीठ पर ढो-ढोकर, आज भी वैसा ही खड़ा है, कहीं भी कुछ नहीं बदला, सब कुछ वैसा ही है, जैसा तुम छोड़ गए थे सालों पहले।’ यह एक लंबी कविता है, जिसका आनंद इसे पूरा पढ़ने में है।

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

अन्नापूर्णा चोटी पर पहली बार पहुंची महिला



द.कोरिया की ओ उन सुन ने मंगलवार को एक बार फिर महिला सशक्तीकरण में नया अध्याय जोड़ दिया। ४४ वर्षीय सुन दुनिया की पहली महिला बन गई जिन्होंने हिमालय की अन्नापूर्णा चोटी पर कदम रखा है। काबिलेगौर है कि अन्नापूर्णा चोटी की ऊंचाई आठ हजार इक्यानवे मीटर है। अन्नापूर्णा दुनिया की दस सबसे ऊंची चोटियों में शामिल है। इस कामयाबी की खुशी सुन के मुंह कुछ इस अंदाज में निकली। मेरे लिए हर चोटी नए ब्याफ्रेंड की तरह है। और यह अहसास में सिर्फ महसूस कर सकती हूं।

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

हिमालय के घाव


प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध उत्तराखंड धीरे-धीरे पारिस्थिक तौर पर खोखला बनता जा रहा है. ऐसा करने का काम जनता का कोई घोषित दुश्मन नहीं बल्कि चुनी हुई सरकारें कर रही है. राज्य को ऊर्जा प्रदेश बनाने का दावा करने वाली उत्तराखंड सरकार ने केंद्र के साथ मिलकर वहां पर सैंकड़ों छोटी-बड़ी विद्युत परियोजनाएं शुरू की हैं. बांध बनाने के लिए पहाड़ों में सुरंग खोदकर नदियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम जारी है. अगर सभी योजनाओं पर काम पूरा हो गया तो एक दिन जल स्रोतों के लिए मशहूर उत्तराखंड में नदियों के दर्शन दुर्लभ हो जाएंगे. इससे जो पारिस्थितिकीय संकट पैदा होगा उससे इंसान तो इंसान, पशु-पक्षियों के लिए भी अपना अस्तित्व बचाना मुश्किल हो जाएगा.
एक तरफ़ भारत सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया है लेकिन उसकी मूल नदी भागीरथी अब पहाड़ी घाटियों में ही ख़त्म होती जा रही है. अपने उद्गम स्थान गंगोत्री से थोड़ा आगे बढ़कर हरिद्वार तक उसको अपने नैसर्गिक प्रवाह में देखना अब मुश्किल हो गया है. गंगोत्री के कुछ क़रीब से एक सौ तीस किलोमीटर दूर धरासू तक नदी को सुरंग में डालने से धरती की सतह पर उसका अस्तित्व ख़त्म सा हो गया है. उस इलाक़े में बन रही सोलह जल विद्युत परियोजनाओं की वजह से भागीरथी को धरती के अंदर सुरंगों में डाला जा रहा है. बाक़ी प्रस्तावित परियोजनाओं के कारण आगे भी हरिद्वार तक उसका पानी सतह पर नहीं दिखाई देगा या वो नाले की शक्ल में दिखाई देगी. मनेरी-भाली परियोजना की वजह से भागीरथी को सुरंग में डालने से अब घाटी में नदी की जगह पर सिर्फ़ कंकड़ दिखाई देते हैं. यही हालत गंगा की दूसरी मुख्य सहायक नदी अलकनंदा की भी है. लामबगड़ में सुरंग में डाल देने की वजह से उसका भी पानी धरती की सतह पर नहीं दिखाई देता. नदी की जगह वहां भी पत्थर ही पत्थर दिखाई देते हैं. आगे गोविंदघाट में पुष्पगंगा के मिलने से अलकनंदा में कुछ पानी ज़रूर दिखाई देने लगता है.
ये हाल तो गंगा की प्रमुख सहायक नदियों भागीरथी और अलकनंदा का है. उत्तराखंड से निकलने वाली बाक़ी नदियों से साथ भी सरकार यही बर्ताव कर रही है. जिस वजह से धीरे-धीरे पहाड़ों का जीवन अपार जल संपदा के होने के बाद भी हर लिहाज़ से शुष्क होता जा रहा है. एक अनुमान के मुताबिक़ राज्य में सुरंगों में डाली जाने वाली नदियों की कुल लंबाई क़रीब पंद्रह सौ किलोमीटर होगी. इतने बड़े पैमाने पर अगर नदियों को सुरंगों में डाला गया तो जहां कभी नदियां बहती थीं वहां सिर्फ़ नदी के निशान ही बचे रहेंगे. इससे उत्तराखंड की जैव विविधता पर क्या असर पड़ेगा इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है. विकास के नाम पर कुदरत के साथ इस तरह का मज़ाक जारी रहा तो विकास चाहे जिसका हो नदियों से भौतिक और सांस्कृतिक तौर पर गहरे जुडे लोगों का जीना ज़रूर मुश्किल हो जाएगा. इन सभी चिंताओं को केंद्र में रखकर उत्तराखंड के विभिन्न जन संगठनों ने मिलकर नदी बचाओ आंदोलन शुरू किया है. लेकिन हैरत की बात ये है कि पर्यावरण से हो रही इतनी बड़ी छेड़छाड़ को लेकर राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई चर्चा नहीं हो रही है.
इस बात का अनुमान कोई भी साधारण बुद्धि का इंसान लगा सकता है कि अगर पहाड़ी नदियों को रोककर सुरंगों में डाला गया तो इससे नदी किनारे बसे गांवों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा. इस बात की शुरूआत हो भी चुकी है. जिन जगहों पर नदियों को सुरंगों में डाला जा चुका है. वहां लोगों के खेत और जंगल सूखने लगे हैं. पानी के नैसर्गिक स्रोत ग़ायब हो गए हैं. सुरंगों के ऊपर बसे गांवों में कई तरह की अस्वाभाविक भूगर्वीय हलचल दिखाई देने लगी हैं. कहीं घरों में दरारें पड़ गई हैं तो कहीं पर ज़मीन धंसने लगी है. चार सौ मेगावॉट की विष्णुप्रयाग विद्युत परियोजना की वजह से चांई गांव में मकान टूटने लगे हैं. भूस्खलन के डर से वहां के कई परिवार तंबू लगाकर खेतों में सोने को मजबूर हैं.

सारे हालात को देखकर ऐसा लग रहा है कि एक दिन उत्तराखंड के पहाड़ी इलाक़ों में सिर्फ़ बांध ही बांध नज़र आएंगे. नदियां सुरंगों में चली जाएंगी. जो इलाक़े बचेंगे उन में खनन का काम चलेगा. इस विकास को देखने के लिए लोग कोई नहीं बचेंगे.
courtesy- http://nainitaali.blogspot.com

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

पहाड़ झांकता है नदी में


मनालीhttp://www.blogger.com/img/blank.gif

पहाड़ झांकता है नदी में
और उसे सिर के बल खड़ा कर देती है नदी
लहरों की लय पर
हिलाती-डुलाती, नचाती-कंपकंपाती है उसे

पानी में कांपते अपने अक्स को देखकर भी
कितना शांत निश्चल है पहाड़
हम आंकते हैं पहाड़ की दृढ़ता
और पहाड़ झांकता है अपने मन में -
अरे मुझ अचल में इतनी हलचल
सोचता है और मन ही मन बुदबुदाता है-
किसी नदी के मन में झांकने की हिम्मत न करे कोई पहाड़

-अरुण आदित्य
यह कविता मनाली शीर्षक कविता शृंखला की छह कविताओं में से एक है। वागर्थ में प्रकाशित।