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सोमवार, 25 अप्रैल 2011

हिमालय आत्मा में बस जाता है

रस्किन बॉण्ड



बात उन दिनों की है, जब मैं इंग्लैंड में रह रहा था। उन दिनों लंदन की भीड़भाड़ और भागमभाग के बीच मुझे हिमालय बहुत याद आता था। उन दिनों हिमालय की स्मृति सबसे ज्यादा तीव्र और स्पष्ट थी। मैं उन्हीं नीले-भूरे पहाड़ों के बीच पला-बढ़ा था। हिमालय मेरी धमनियों में बह रहे रक्त के साथ प्रवाहित था। और अब हालांकि मैं उससे बहुत दूर पहुंच गया था और बीच में हजारों मील लंबा समंदर, मैदान और रेगिस्तान था, लेकिन हिमालय मेरी स्मृतियों से मुक्त न हो सका। अगर आप अपनी जिंदगी के किसी भी मोड़ या मौके पर हिमालय के साथ कुछ वक्त रहे हों तो वह आपका हिस्सा हो जाता है। उससे बच निकलने का कोई उपाय नहीं।

और इसी तरह लंदन में मार्च के एक दिन कोहरा इतना घना था कि वह धुंध का पहाड़ बन गया और उसके बीच लोगों की भीड़ मानो पहाड़ों के बीच से लहराती-बलखाती निकलती हुई गंगा बन गई। लंदन में तो इस कल्पना भर से संतोष करना पड़ता था। मुझे याद है वह छोटा सा पहाड़ी रास्ता, जो मेरे बेचैन, अधीर कदमों को ओक और बुरुंश के ठंडे, खूबसूरत जंगल की ओर ले गया और फिर पहाड़ी के उस सबसे ऊंचे शिखर पर, जहां तेज, ठंडी हवाएं अपने साथ बहा ले जाने को आतुर थीं।

उस पहाड़ी का नाम था- क्लाउड्स एंड यानी जहां बादल खत्म हो जाते हैं। उस पहाड़ी के एक ओर दूर तक फैले हुए मैदानी भाग का दृश्य था और दूसरी ओर बर्फ से ढंके हुए पहाड़ों की अंतहीन श्रंखला। चांदनी से भरी हुई छोटी-छोटी पहाड़ी नदियां पर्वतों के बीच घाटियों से होकर बह रही थीं। उन नदियों के बीच-बीच में उगे हुए चावल के खेत ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो हरे रंग की मणियां जड़ी हुई हों। और वहां पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर हवाएं सर-सर की आवाज करती हुई देवदार की ऊंची घनी झाड़ियों के बीच से बह रही थीं मानो देवदार को उन्होंने अपनी बांहों में समेट लिया हो।

बारिश के मौसम में बादल पूरी घाटी को ढंक लेते हैं, लेकिन पहाड़ी की यह चोटी बादलों से अछूती रहती है। बादलों की धुंध के बीच यह घाटी किसी ऊंचे टापू की तरह खड़ी हुई नजर आती है। इस पहाड़ी रास्ते के एक कोने में एक पुरानी मधुशाला के कुछ टूटे-फूटे अवशेष पड़े हैं। उसकी छत तो न जाने कब की गायब हो गई और बारिश ने उसकी फर्श को पीला और मुलायम बना दिया है। यहां एक उद्यमी अंग्रेज रहा करता था, जिसने अपनी समूची जिंदगी उस पहाड़ पर ही बिताई।

वह मैदान के लोगों के लिए बीयर बनाया करता था। अब उसके घर की दीवारों में काई और झाड़-झंखाड़ का वास है। पत्थरों के नीचे एक जंगली बिल्ली ने अपना घर बना लिया है। प्यारी सी जंगली भूरी बिल्ली, बड़ी-बड़ी हरी आंखों वाली। लेकिन वो बस दूर से ही मुझे तकती रहती है, पास नहीं फटकती। इस पहाड़ी पर कोई रहता नहीं है, लेकिन गांव वाले अकसर यहां से होकर गुजरते जरूर हैं। वे यहां अपनी भेड़ें और गायें चराने के लिए ले आते हैं। हर गाय और भेड़ के गले में एक घंटी लटकी हुई होती है। इससे चरवाहे को पता चलता रहता है कि वो कहां घास चर रही है। अब वो चरवाहा मजे से पेड़ की छाया में लेटकर आराम फरमा सकता है और स्ट्रॉबेरी का आनंद ले सकता है। बिना इस बात की परवाह किए कि जानवर कहीं भटक न जाएं। मैं कुछ चरवाहे लड़कों और लड़कियों को अच्छी तरह जानता हूं। एक चरवाहा था, जो बहुत अच्छी बांसुरी बजाता था। उसकी सुंदर मीठी धुन पहाड़ों की हवा में घुल-मिल जाती और दूर तक सुनाई पड़ती थी। मुझे देखते ही वह बांसुरी अपने होंठों से हटाए बगैर धीरे से सिर झुकाकर मेरा अभिवादन करता था।

वहां एक लड़की भी थी, जो हमेशा पशुओं के चारे के लिए घास काटती हुई दिख जाती थी। वह अपने पैरों में मोटी-मोटी पायल पहने रहती थी और कान में चांदी के लंबे-लंबे झुमके। हालांकि वह कभी कुछ बोलती नहीं थी, लेकिन जब भी वह रास्ते में कभी मुझसे मिलती तो उसके चेहरे पर सुंदर मुस्कराहट होती थी। वह कभी खुद के साथ, कभी भेड़ या घास के साथ तो कभी अपने हाथों में हंसिया लिए गाना गाती रहती थी।

और एक लड़का भी था, जो शहर दूध लेकर जाता था। वह अकसर मुझसे रास्ते में टकरा जाता और फिर लंबी-लंबी बातें करता। वह कभी पहाड़ों से दूर कहीं नहीं गया था और न ही उसने कोई बड़ा शहर देखा था। वह कभी ट्रेन में भी नहीं बैठा था। मैं उसे शहरों की कहानियां सुनाता था और वह मुझे गांवों की। कैसे गांव में लोग मकई से ब्रेड बनाते हैं, कैसे मछली पकड़ी जाती है, कैसे भालू चुपके से आकर कद्दू चुरा ले जाते हैं। उसने मुझे बताया कि जब कद्दू पककर तैयार हो जाता है तो भालू चुपके से आते हैं उसे चुराने के लिए। लंदन में ये सारी चीजें मेरी स्मृतियों में बसी हुई थीं। मुझे सबकुछ याद आता था। मुझे याद आती थी, चीड़ और देवदार की महक, ओक की पत्तियां और मैपल के वृक्ष। हिमालय में विचरने वाले पक्षियों की ध्वनियां याद आती थीं। हिमालय में बसी हुई धुंध भी।

कई बार ऐसा होता है कि कोई छोटी सी घटना, बातचीत का कोई एक मामूली सा टुकड़ा अचानक हमें किसी बीते हुए की याद दिला देता है। हमें अतीत की खोह में ले जाता है। किसी ऐसी जगह जहां, उस पुरानी स्मृति की कल्पना भी नहीं की जा सकती, वो बीती बातें लौट-लौटकर याद आने लगती हैं। लंदन में सोमवार की एक सुबह मैं भीड़-भड़क्के वाली एक ट्यूब ट्रेन में सफर कर रहा था। मेरे सामने एक सज्जन अखबार पढ़ रहे थे। अखबार का आखिरी पन्ना मेरी आंखों के सामने खुला हुआ था। तभी मेरी निगाह उस पन्ने पर पड़ी। उस अखबार में एक भालू का चित्र था, जिसके हाथों में कद्दू था।

अचानक लंदन के गॉड्गे स्ट्रीट और टॉटेनहेम कोर्ट रोड स्टेशनों के बीच से गुजरते हुए हिमालय की वो सारी स्मृतियां, गंध, तस्वीरें और आवाजें मेरे जेहन में ताजा हो उठीं। पुराना सबकुछ याद आने लगा। हिमालय मेरे भीतर उमड़-उमड़कर फूट पड़ रहा था।

रस्किन बॉण्ड
लेखक पद्मश्री से सम्मानित ब्रिटिश मूल के साहित्यकार हैं।

मंगलवार, 29 मार्च 2011

रमेश का ‘द ग्रेट इंडियन टाइगर शो’




बाघों की तादाद में बढ़ोतरी की जो रिपोर्ट सनसनीखेज बनाकर वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने पेश की है, दरअसल उसकी सच्चाई कुछ और है। आंकड़ों पर गौर करें तो बाघों की तादाद 1411 (2006) से बढ़कर 1706 हो गई है, लेकिन यह उपलब्धि आंकड़ों की शानदार बाजीगरी से ज्यादा कुछ नहीं है।

पिछली के मुकाबले इस बार की गणना में 295 बाघ ज्यादा पाए गए हैं, लेकिन यह नहीं बताया गया है इस बार सुंदरबन और पश्चिम बंगाल व उड़ीसा के नक्सल प्रभावित इलाकों को भी इस रिपोर्ट में शामिल किया गया है जो पिछली बार शामिल नहीं थे। अकेले सुंदरबन में ही तकरीबन 70 बाघ हैं।

यानी जो बाघ बढ़े हैं वो पिछली बार भी थे लेकिन उनकी गिनती नहीं की गई थी। बाघों की वृद्धि के आंकड़े कई और सवालों की ओर भी इशारा कर रहे हैं। मसलन, बाघों की जो बढ़ोतरी रिपोर्ट में दर्ज है वह उन इलाकों से नहीं आई है जहां प्रोजेक्ट टाइगर दशकों से चल रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि अब तक प्रोजेक्ट टाइगर पर साल 2010 तक खर्च हो चुके 892.18 करोड़ रु. आखिर जा कहां रहे हैं?

और तो और बाघों का आवास स्थल भी बढऩे के बजाय कम होकर 728000 हेक्टे. में ही रहा गया है। 2006 में यह 936000 हेक्टे. था। राजस्थान के संदर्भ में भी इस रिपोर्ट में कोई खुशखबरी नहीं है। यहां की स्थिति कमोबेश वही है जो पिछली गणना के वक्त थी। लब्बोलुआब यह है कि वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बाघों की वृद्धि की खूबसूरत मार्केटिंग तो की है, जबकि आंकड़े इतना खुश नहीं करते।

केवल पहाड़ों पर आता है वसंत


रस्किन बॉन्ड

आज जब पीछे लौटकर देखता हूं तो एकबारगी यकीन ही नहीं होता कि मैंने इन पहाड़ों पर इतने साल बिता दिए। 25 गर्मियां और मानसून और सर्दियां और वसंत (वसंत केवल पहाड़ों पर ही होता है, मैदानी इलाकों में नहीं)। मुझे वह आज भी कल ही की बात लगती है, जब मैं यहां पहली बार आया था।

समय गुजर जाता है, लेकिन गुजरकर भी गुजर नहीं पाता। लोग आते और चले जाते हैं, लेकिन पहाड़ अपनी जगह पर बने रहते हैं। पहाड़ जिद्दी होते हैं। वे अपनी जगह छोड़ने से इनकार कर देते हैं। हम चाहें तो विस्फोट करके उनके दिल में छेद कर दें या उनसे उनके वृक्षों का आवरण छीन लें या उनकी नदियों पर बांध बनाकर उनका रुख मोड़ दें या सुरंगें, सड़कें और पुल बना दें, लेकिन हम इन पहाड़ों को उनकी जगह से बेदखल नहीं कर सकते। मुझे उनकी यही बात सबसे अच्छी लगती है।

मुझे यह सोचकर अच्छा लगता है कि मैं पहाड़ों का एक हिस्सा बन गया हूं। मैं यहां इतने समय से रह रहा हूं कि अब मेरा इन दरख्तों, जंगली फूलों और चट्टानों से गहरा नाता बन चुका है। कल शाम जब मैं बलूत के दरख्तों के नीचे से होकर गुजर रहा था, तब मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं इस जंगल का एक हिस्सा हूं। मैंने अपना हाथ एक बूढ़े दरख्त के तने पर टिका दिया। जैसे ही मैं मुड़ा, पेड़ की पत्तियों ने मेरे चेहरे को सहला दिया। मानो वे इसके लिए मेरा आभार स्वीकार रही हों।

एक दिन मैंने सोचा कि यदि हम इन दरख्तों को बहुत ज्यादा सताएंगे तो कहीं ऐसा न हो किसी दिन वे अपनी जड़ें समेटकर कहीं और चले जाएं। शायद किसी और पर्वत श्रंखला पर, जहां मनुष्यों की पहुंच न हो। मैंने कई जंगलों को इसी तरह गायब होते देखा है। अब तो इन जंगलों को कहीं और जाने से रोकने के लिए काफी बातें की जाने लगी हैं। आजकल पर्यावरणविद् होना भी एक फैशन है। ठीक है। लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि हमसे बहुत देर हो चुकी हो?

कॉनराड, मेलविल, स्टीवेंसन, मेसफील्ड जैसे कई महान लेखकों ने समुद्र के वैभव का उत्सव मनाया है, लेकिन ऐसे कितने लेखक हैं, जो पहाड़ों की निरंतरता को अपनी विषयवस्तु बनाते रहे हैं? पहाड़ों के बारे में कोई सच्ची भावना प्राप्त करने के लिए संभवत: मुझे प्राचीन चीन के ताओ कवियों की ओर मुड़ना होगा। किपलिंग जरूर कभी-कभी पहाड़ों का उल्लेख कर देते हैं, लेकिन मुझे पता नहीं कि किन भारतीय लेखकों ने हिमालय के बारे में महत्वपूर्ण साहित्य रचा है। कम से कम आधुनिक लेखकों में से तो किसी ने हिमालय पर नहीं लिखा। आमतौर पर लेखकों को अपनी आजीविका चलाने के लिए मैदानी इलाकों में ही गुजर-बसर करनी पड़ती है। लेकिन मेरे जैसे लेखक के लिए पहाड़ बहुत ही उदार साथी साबित हुए हैं।

वास्तव में पहाड़ शुरू से ही मेरे प्रति उदार रहे। मैंने दिल्ली में अपनी नौकरी छोड़ दी थी और पहाड़ों की गोद में रहने चला आया था। आज बहुतेरे हिल स्टेशन अमीरों की आरामगाह हैं, लेकिन पच्चीस साल पहले यहां गरीब-गुरबे लोग बहुत कम आमदनी में भी मजे से रहते थे। यहां बहुत कम कारें दिखाई देती थीं और अधिकतर लोग पैदल ही चलते थे। मेरी कॉटेज बलूत और मेपल के जंगल के किनारे पर थी और मैंने वहां आठ-नौ साल बिताए। वे बहुत खुशनुमा साल थे और इस दौरान मैं कहानियां, निबंध, कविताएं और बच्चों के लिए किताबें लिखता रहा। पहाड़ों पर रहने से पहले मैं बच्चों के लिए कुछ नहीं लिख पाया था।

मुझे लगता है कि इसका कोई न कोई संबंध प्रेम के बच्चों से होगा। प्रेम और उसकी पत्नी ने मेरे घर की देखरेख का पूरा जिम्मा अपने कंधों पर उठा लिया था। मैं तो खैर इन मामलों में अनाड़ी ही हूं। मैं तो अपने आपको बिजली के फ्यूज, गैस सिलेंडर, पानी के पाइप, आंधी में उड़ जाने वाली टिन की छत जैसी चीजों के सामने असहाय ही महसूस करता हूं। प्रेम और उसकी पत्नी के कारण ही मैं लेखन में मन लगा पाया। उनके बच्चे मुकेश, राकेश और सावित्री हमारे मेपलवुड कॉटेज में ही पले-बढ़े। यह स्वाभाविक ही था कि मैं उनके परिवार का एक अभिन्न हिस्सा बन गया। एक दत्तक पितामह। राकेश के लिए मैंने चेरी के एक ऐसे दरख्त की कहानी लिखी, जो पनप नहीं पा रहा था। नटखट मुकेश के लिए मैंने भूकंप से संबंधित एक कहानी लिखी। सावित्री के लिए मैंने कविताएं और गीत लिखे।

पहाड़ों पर रहते हुए मुझे ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ कि मेरे पास लिखने के लिए कुछ भी नहीं है। पहाड़ी के नीचे एक छोटी-सी नदी बहती थी और उसने मुझे छोटे जीव-जंतुओं, जंगली फूलों, परिंदों, कीड़े-मकोड़ों, पौधों के बारे में बहुत कुछ सिखाया। आस-पड़ोस के गांव और वहां रहने वाले खुशमिजाज लोग हमेशा मुझे आकर्षित करते रहे। लेंडूर और मसूरी हिल स्टेशनों के पुराने घर और इनमें रहने वाले लोग भी हमेशा मेरी दिलचस्पियों के दायरे में रहे। मैं पहाड़ों की पगडंडियों पर पैदल चलता रहा। कभी-कभी मैं सड़क किनारे चाय की दुकान या किसी देहाती स्कूल में जाकर थोड़ी देर सुस्ता लेता। किपलिंग ने कहा था कि पहाड़ों की गोद में जाना मां की गोद में जाने की तरह है। इससे सच्ची बात शायद ही कोई दूसरी हो सकती है। पहाड़ एक गर्वीली किंतु प्रेम करने वाली मां की तरह हैं। जब भी मैं लौटकर उनके पास गया, उन्होंने स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया। मैं कभी उनसे दूर नहीं हो पाया।

लेकिन कुछ कठिनाइयां भी आती रहीं। कभी-कभी ऐसा होता कि मेरा सारा पैसा खत्म हो जाता। मैं अपने लेखन से इतना पैसा कभी नहीं कमा पाया कि अपने लिए एक अच्छा-सा घर बनवा पाऊं। अगर मैं लंदन में होता या अपने भाई की तरह कनाडा में या फिर मुंबई में ही होता तो शायद मैं इससे ज्यादा पैसे कमा पाता। लेकिन अगर मुझे फिर से चुनाव करने का मौका मिले, तब भी मैं इन पहाड़ों को ही चुनूंगा। पहाड़ हमें जिस तरह की स्वतंत्रता देते हैं, वह कोई और जगह नहीं दे सकती। इस मायने में पहाड़ स्वर्ग के बहुत करीब हैं।