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शनिवार, 16 जुलाई 2011

बैटल फॉर लाइफ



राजस्थान के रणथमभौर नेशनल पार्क में पिछळे दिनों एक ऐसा नजारा दिखा जो बरसों में एकाध बार होता है। एक बाघ और मादा भालू का आमना सामना। हुआ यूं कि मां भालू अपने दो छोटे बच्चों के साथ उन्हें पानी पिलाने ले जा ही रही थी कि सामने से एक बाघ आ गया और उसे लगा कि इन दो छोटे भालुओं से बेहतर शिकार क्या होगा। लेकिन मां भालू ने ये होने नहीं दिया और बाघ को पटखनी दे दी। वो सीधी लड़ाई के मूड में आ गई , जिससे बाघ को बैकफुट पर आना पड़ा। मां अपने दोनों बच्चों को पीठ पर बैठाकर वहां से गायब हो गई...

इन पलों को कैमरे में कैद किया है आदित्य सिंह ने

मंगलवार, 29 मार्च 2011

रमेश का ‘द ग्रेट इंडियन टाइगर शो’




बाघों की तादाद में बढ़ोतरी की जो रिपोर्ट सनसनीखेज बनाकर वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने पेश की है, दरअसल उसकी सच्चाई कुछ और है। आंकड़ों पर गौर करें तो बाघों की तादाद 1411 (2006) से बढ़कर 1706 हो गई है, लेकिन यह उपलब्धि आंकड़ों की शानदार बाजीगरी से ज्यादा कुछ नहीं है।

पिछली के मुकाबले इस बार की गणना में 295 बाघ ज्यादा पाए गए हैं, लेकिन यह नहीं बताया गया है इस बार सुंदरबन और पश्चिम बंगाल व उड़ीसा के नक्सल प्रभावित इलाकों को भी इस रिपोर्ट में शामिल किया गया है जो पिछली बार शामिल नहीं थे। अकेले सुंदरबन में ही तकरीबन 70 बाघ हैं।

यानी जो बाघ बढ़े हैं वो पिछली बार भी थे लेकिन उनकी गिनती नहीं की गई थी। बाघों की वृद्धि के आंकड़े कई और सवालों की ओर भी इशारा कर रहे हैं। मसलन, बाघों की जो बढ़ोतरी रिपोर्ट में दर्ज है वह उन इलाकों से नहीं आई है जहां प्रोजेक्ट टाइगर दशकों से चल रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि अब तक प्रोजेक्ट टाइगर पर साल 2010 तक खर्च हो चुके 892.18 करोड़ रु. आखिर जा कहां रहे हैं?

और तो और बाघों का आवास स्थल भी बढऩे के बजाय कम होकर 728000 हेक्टे. में ही रहा गया है। 2006 में यह 936000 हेक्टे. था। राजस्थान के संदर्भ में भी इस रिपोर्ट में कोई खुशखबरी नहीं है। यहां की स्थिति कमोबेश वही है जो पिछली गणना के वक्त थी। लब्बोलुआब यह है कि वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बाघों की वृद्धि की खूबसूरत मार्केटिंग तो की है, जबकि आंकड़े इतना खुश नहीं करते।

सोमवार, 27 सितंबर 2010

हिमालय की ऊँचाइयों पर बाघ का वजूद

बीबीसी की नेचुरल हिस्ट्री टीम ने हिमालय की ऊँचाइयों में एक प्राकृतिक ख़ज़ाना ढूँढा है जोकि आमतौर पर जंगलों में ही पाया जाता है...

बीबीसी की नेचुरल हिस्ट्री यूनिट का दावा है कि उन्होंने अपने कैमरों में हिमालय की ऊंचाई में रहने वाले बाघ की तस्वीरें कैद की हैं। यह इस बात का पहला प्रमाण है कि बाघ 12000 फीट की ऊंचाई पर रह सकते हैं और अपना परिवार भी बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बात इस खत्म हो रहे जीव को बचाने में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है और यह इलाका वाइल्ड कॉरिडोर के तौर पर विकसित किया जा सकता है।
दरअसल बीबीसी की नेचुरल हिस्ट्री यूनिट ने भूटान के पहाड़ों में दर्जनों कैमरा ट्रैप लगाकर महीनों इंतजार किया। उन्होंने 4000 मीटर (तकरीबन 12000 फीट) ऊंचाई पर रहने वाले नर और मादा बाघ की विडियो रिकॉर्डिंग की है। पहले यह माना जाता था कि जंगल में रहने वाले किसी जीव के लिए इतनी ऊंचाई पर रहना नामुमकिन है। हालांकि इससे पहले भी बंगाल टाइगर को इतनी ऊंचाई पर कैमरों में कैद किया गया है लेकिन बीबीसी की नेचुरल हिस्ट्री यूनिट का दावा है कि यह वो पहला सबूत है जिससे पता चलता है कि इतनी ऊंचाई पर भी बाघ न केवल रह सकते हैं बल्कि प्रजनन भी कर सकते हैं।

दूध पिलाती दिखी बाघिन
वीडियो में एक बाघिन अपने शावक को दूध पिलाती हुई दिखाई दे रही है। वहीं अन्य क्लिप में बाघ अपने इलाके का निर्धारण करता हुआ दिखाई दे रहा है जो दर्शाता है कि बाघ केवल उस इलाके से गुजर ही नहीं रहा है बल्कि वहीं रहता भी है। बकौल वाइल्डलाइफ कैमरामैन गॉर्डन बुकानन, यह बाघ के संरक्षण की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण खोज है।

इस खोजी टीम में पर्वतारोही स्टीव बैकशेल के अलावा टाइगर कंजर्वेशनिस्ट एलन रबिनोविट्ज ने स्थानीय ग्रामीणों की उस सूचना पर गौर कर काम शुरू किया जिसमें कहा गया था कि इस इलाके में बाघ देखे गए हैं।