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मंगलवार, 29 मार्च 2011

रमेश का ‘द ग्रेट इंडियन टाइगर शो’




बाघों की तादाद में बढ़ोतरी की जो रिपोर्ट सनसनीखेज बनाकर वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने पेश की है, दरअसल उसकी सच्चाई कुछ और है। आंकड़ों पर गौर करें तो बाघों की तादाद 1411 (2006) से बढ़कर 1706 हो गई है, लेकिन यह उपलब्धि आंकड़ों की शानदार बाजीगरी से ज्यादा कुछ नहीं है।

पिछली के मुकाबले इस बार की गणना में 295 बाघ ज्यादा पाए गए हैं, लेकिन यह नहीं बताया गया है इस बार सुंदरबन और पश्चिम बंगाल व उड़ीसा के नक्सल प्रभावित इलाकों को भी इस रिपोर्ट में शामिल किया गया है जो पिछली बार शामिल नहीं थे। अकेले सुंदरबन में ही तकरीबन 70 बाघ हैं।

यानी जो बाघ बढ़े हैं वो पिछली बार भी थे लेकिन उनकी गिनती नहीं की गई थी। बाघों की वृद्धि के आंकड़े कई और सवालों की ओर भी इशारा कर रहे हैं। मसलन, बाघों की जो बढ़ोतरी रिपोर्ट में दर्ज है वह उन इलाकों से नहीं आई है जहां प्रोजेक्ट टाइगर दशकों से चल रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि अब तक प्रोजेक्ट टाइगर पर साल 2010 तक खर्च हो चुके 892.18 करोड़ रु. आखिर जा कहां रहे हैं?

और तो और बाघों का आवास स्थल भी बढऩे के बजाय कम होकर 728000 हेक्टे. में ही रहा गया है। 2006 में यह 936000 हेक्टे. था। राजस्थान के संदर्भ में भी इस रिपोर्ट में कोई खुशखबरी नहीं है। यहां की स्थिति कमोबेश वही है जो पिछली गणना के वक्त थी। लब्बोलुआब यह है कि वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बाघों की वृद्धि की खूबसूरत मार्केटिंग तो की है, जबकि आंकड़े इतना खुश नहीं करते।