गुरुवार, 8 जुलाई 2010

अभिशप्त नेपाल की राजनीति

                                                                           

                   
           कनकमणि दीक्षित
पिछले महीने जब एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) और कुछ प्रबुद्ध लोग प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल पर सत्तालोलुप होने और प्रधानमंत्री की कुर्सी नहीं छोड़ने का आरोप लगा रहे थे, खुद नेपाल ने भनक तक नहीं लगने दी कि वह इस्तीफा देने वाले हैं।
30 जून को जब उन्होंने इस्तीफा दिया, माओवादी, उनकी अपनी पार्टी के लोग, गठबंधन के सहयोगी दल सभी हैरान रह गए। इनमें नेपाली कांग्रेस भी शामिल थी, जिसने पिछले तेरह महीनों में हर मुश्किल में उनका साथ दिया था। सच्चाई यह है कि अप्रैल 2008 में संविधान सभा के चुनाव में प्रधानमंत्री नेपाल (अब कार्यवाहक) ने दो क्षेत्रों से चुनाव लड़ा था और दोनों ही जगहों से हार गए थे। यह भी सच है कि सर्वानुमति बनाने में उनकी महारत को देखते हुए खुद माओवादियों ने उन्हें संविधान सभा का सदस्य बनाने की वकालत की थी और इसी वजह से वह प्रधानमंत्री भी बन सके थे।
माओवादियों ने मई 2009 में सरकार से इस्तीफा दिया था। वजह यह थी कि सेना प्रमुख रुकमांगद कटवाल को बर्खास्त करने के प्रयास में माओवादियों ने राष्ट्रीय सेना में कमान बदलने को लेकर दुस्साहसी और अड़ियल रवैया अख्तियार कर लिया था। तभी से राष्ट्रपति रामबरन यादव और प्रधानमंत्री नेपाल माओवादियों के खास तौर पर निशाने बन गए थे। माओवादियों को जल्दी ही इस्तीफा देने की अपनी भयानक भूल का अहसास हो गया। उन्होंने प्रधानमंत्री नेपाल को अपदस्थ करने का कोई तरीका बाकी नहीं छोड़ा।
माधव कुमार नेपाल प्रारंभ से ही कमजोर प्रधानमंत्री थे। इसका प्रमुख कारण यह था कि नेपाली कांग्रेस के सुप्रीमो गिरिजा प्रसाद कोईराला ने तय किया कि बेटी सुजाता मंत्रिमंडल में उनकी पार्टी का नेतृत्व करेंगी, जो विदेश मंत्री बनीं और उपप्रधानमंत्री भी।

नतीजा यह हुआ कि दूसरी पार्टियों के दिग्गज नेताओं ने सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया। खुद नेपाल को हालांकि शुचिता और ईमानदारी के लिए जाना जाता था, लेकिन उनकी सरकार में न इच्छाशक्ति थी, न सामथ्र्य। ऊपर से कई मंत्री भ्रष्टाचार व ज्यादतियों के आरोपों से घिरे थे।
लेकिन एक कमजोर सरकार को भी संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया से ही गिराया जाना चाहिए और माओवादी यही नहीं कर पा रहे थे। सत्तारूढ़ गठबंधन की छोटी-बड़ी सभी 22 पार्टियों में माओवादियों का भय इस कदर था कि कोई भी पार्टी नेपाल सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की माओवादियों की कोशिश के समर्थन में टूटकर नहीं आई।

प्रधानमंत्री नेपाल को मजबूर करने के लिए माओवादी तीखे भाषणों और सड़कों पर उतर आए। पहले पांच महीने तो उन्होंने संसद का बहिष्कार और उसे ठप किया। बाद में दो महीने काठमांडू में कठपुतली सरकार खड़ी करने के लिए नई दिल्ली को दोषी ठहराते हुए उग्र-राष्ट्रवादी और भारत-विरोधी अभियान छेड़ दिया।
उससे भी बात नहीं बनी तो सीधा कार्रवाई करते हुए मई की शुरुआत में अनिश्चितकालीन राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल कर दी। उन्हें लगता था कि इसके बाद जनता विद्रोह कर देगी और सरकार गिर जाएगी। लेकिन हुआ यह कि योजना व तैयारी के साथ आयोजित उनकी मई दिवस रैली पर काठमांडु के दरबार चौक में आयोजित स्वत:स्फूर्त शांति सभा भारी साबित हुई।

आम हड़ताल से मकसद नहीं सधा। नेपाल सरकार तो नहीं ही झुकी, देश भर में माओवाद-विरोधी भावना गहराने लगी। लोग कहने लगे कि माओवादी अध्यक्ष पुष्प कमल दहल ने पिछले वर्ष गंवाई प्रधानमंत्री की कुर्सी वापस पाने के अपने निजी एजेंडे के लिए पार्टी और समाज दोनों को बंधक बना लिया है। अंतत: हड़ताल वापस लेनी पड़ी।
जून 2010 के घटनाक्रम को लेकर खुद माओवादी नेताओं में मतभेद उभरने लगे। पार्टी ने तय किया कि वह सरकार के बजट का समर्थन नहीं करेगी। प्रधानमंत्री नेपाल इस आशंका से भी घिरे थे कि उन्हीं की पार्टी के कुछ नेता अध्यक्ष झलनाथ खनाल के नेतृत्व में संसद के पटल पर बजट को चुनौती दे सकते थे।

इससे सरकार अपमानजनक ढंग से गिरती। लिहाजा प्रधानमंत्री नेपाल ने खुद इस्तीफा देना बेहतर समझा। अध्यक्ष खनाल को हमेशा लगता था कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर उनका हक है और उनके साथ धोखा किया गया है। इसलिए पूरा साल उन्होंने अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ बयान देते हुए बिताया।

राष्ट्रपति यादव ने सभी राजनीतिक दलों से कहा है कि वे सरकार के नेतृत्व के लिए सर्वानुमत उम्मीदवार 7 जुलाई तक खोज लें। इस समय सीमा में यह हो पाना अब संभव दिखाई नहीं देता। संविधान की रचना के लिए बेहतर यही है कि सभी दलों की राष्ट्रीय सरकार सत्ता में आए, लेकिन साफ है कि बहुमत-प्राप्त गठबंधन सरकार ही बन सकती है।

संभावना कम है कि अन्य बड़ी पार्टियां यूसीपीएन (माओवादी) को गठबंधन का नेतृत्व सौंपने पर राजी होंगी। बावजूद इसके कि यह सदन में 38 फीसदी उपस्थिति के साथ सबसे बड़ी पार्टी है। अन्य दल माओवादियों को समर्थन देने से इसलिए हिचकते हैं क्योंकि उन्होंने अपने सैन्य और अर्धसैन्य संगठनों को कायम रखा है।

कुछ लड़ाकों को सेना में शामिल करके और बाकी को एक फॉर्मूले के तहत बसाकर इन संगठनों को खत्म करने पर वे टालमटोल कर रहे हैं। इस वक्त माओवादी भीतर से और भी कमजोर हो गए हैं। शिखर के तीन नेताओं पुष्प कमल दहल, बाबूराम भट्टराई और मोहन वैद्य में मतभेद की वजह से उनके लिए संयुक्त रूप से काम कर पाना मुश्किल हो गया है। ये मतभेद पिछले हफ्ते और तीव्र ही हुए हैं। नेपाली कांग्रेस ने दावा किया है कि अगला प्रधानमंत्री उनकी पार्टी का हो। सच यह है कि हाल ही में एकीकृत हुई कांग्रेस भी चार बार प्रधानमंत्री रह चुके शेर बहादुर देउबा और संसदीय दल के निर्वाचित नेता राम चंद्र पौडेल के बीच बंटी हुई है।
अगला प्रधानमंत्री जो भी हो, उसके कंधों पर पहली जिम्मेदारी राजनीतिक स्थिरता लाने और शांति प्रक्रिया को पूर्णता तक पहुंचाकर समाज को राहत देने की होगी। तभी लोकतांत्रिक संविधान की रचना के लिए जरूरी परिस्थितियों का निर्माण हो सकेगा। माओवादियों के जनयुद्ध और अप्रैल 2006 के जनांदोलन के बाद पूरे चार सालों से लगभग ठप पड़े समाज के लिए यह राहत बेहद जरूरी है।

अगला प्रधानमंत्री यूसीपीएन (माओवादी) की जमात से हो, इसके लिए जरूरी होगा कि पार्टी माओवादियों छावनियों को और यूथ कम्युनिस्ट लीग की बैरकों को खत्म करने के लिए विश्वसनीय समय सीमा में तेजी से कदम उठाए। अध्यक्ष दहल को भी पार्टी की ओर से किसी ओर को सरकार का नेतृत्व सौंपने के लिए राजी होना होगा।

ये दोनों ही चीजें निकट भविष्य में होती दिखाई नहीं देतीं, इसलिए संभावना यही है कि नेपाल का नया प्रधानमंत्री नेपाली कांग्रेस या सीपीएन(यूएमएल) का होगा। संभावित दावेदार राम चंद्र पौडेल, झलनाथ खनाल या एक बार फिर माधव कुमार नेपाल हो सकते हैं।

 लेखक नेपाल के प्रतिष्ठित पत्रकार हैं।

कोई टिप्पणी नहीं: