सोमवार, 14 मार्च 2011

गुलों से गुपचुप दो-चार बातें: रस्किन बॉन्ड


अब मैं इतना भी नहीं कहूंगा कि एक सुंदर-सा बगीचा हर समस्या का हल है या हर दुख का इलाज है। लेकिन फिर भी यह जानना कितना आश्चर्यजनक है कि जब हम कमजोर और असहाय महसूस करते हैं तो इस धरती के साथ संवाद हमें फिर से नई ऊर्जा और ताकत से भर देता है।

जब भी मैं कोई कहानी या निबंध लिखते हुए बीच में अटक जाता हूं तो पहाड़ी के एक कोने पर बने अपने छोटे-से बगीचे में चला जाता हूं। वहां मैं पौधे लगाता हूं। कूड़ा-करकट और घास-पात साफ करता हूं। पौधों की कटाई-छंटाई करता हूं या फिर मुरझाई हुई कलियों की छंटाई करता हूं और ये सब करते हुए तुरंत मेरे मन में नए विचार आते हैं और रुकी हुई कहानी या ठहरे हुए निबंध को रास्ता मिल जाता है। थम गई कविता को मंजिल मिल जाती है।

ऐसा नहीं है कि हर माली लेखक ही होता है। लेकिन अपने बगीचे की सुंदरता और गुणों को अपने भीतर आत्मसात कर लेने के लिए लेखक होना कोई जरूरी भी नहीं है। मेरा दोस्त बलदेव दिल्ली में बहुत बड़ा बिजनेस चलाता है। उसने मुझे बताया कि अपने बगीचे में कम से कम आधा घंटा बिताए बगैर वह ऑफिस जाने की कल्पना भी नहीं कर सकता। अगर आप अपने दिन की शुरुआत बगीचे में गिरी ओस की बूंदों को देखने से करते हैं तो आप ऑफिस में भयावह बोर्ड मीटिंगों का भी सामना कर सकते हैं।

एक और पुराना दोस्त है सिरिल। उसी का उदाहरण ले लीजिए। जब मैं उससे मिला तो वह एक इमारत की पहली मंजिल पर एक छोटे-से अपार्टमेंट में रहता था। मैंने सोचा बेचारा सिरिल, यहां तो वह एक बगीचा भी नहीं बना सकता। लेकिन जब मैं उसके घर में गया तो देखा कि उसका कमरा एक लंबे-चौड़े बरामदे से घिरा हुआ था। वहां काफी मात्रा में धूप और हवा आने की जगह थी। नतीजा यह कि वहां ढेर सारे फूल और लहलहाती हरी पत्तियां नजर आईं। एक क्षण को तो मुझे ऐसा लगा कि मैं लंदन के क्यू गार्डन के किसी ग्रीन हाउस में आ गया हूं। लंदन में अपने छोटे-से प्रवास के दौरान वहां मैं अकसर चहलकदमी किया करता था। लहरदार लताओं और पौधों के बीच से सिरिल मेरे लिए एक कुर्सी निकाल लाया। एक पौधे के पीछे से एक छोटी-सी कॉफी टेबल भी प्रकट हो गई।

अब तक चारों तरफ पेड़-पौधों और हरियाली से खिले हुए इस माहौल में मैं काफी जीवंत हो उठा था। मैंने पाया कि वहां पर कम से कम दो मेहमान और थे। एक बड़ा-सा फिलोडेन्डॉम का पौधा था। उसका बड़ा-सा आकार किसी पेड़ सरीखा ही था। दूसरा भी एक बड़े-से गमले में विराजमान मासूम-सा पौधा था। बेशक सिरिल अपवाद है। जरूरी नहीं कि हम सबके पास ऐसा बरामदा हो ही, जहां धूप और हवा की ऐसी आवाजाही हो सके। लेकिन एक बात और भी है। सिरिल उन पौधों से घर में आने वाली इल्लियों और झींगों के प्रति जितना उदार और सहनशील है, संभवत: मैं नहीं हो सकता। वह तब तक अच्छा-खासा खुशहाल व्यक्ति था, जब तक नीचे रहने वाले उसके मकान मालिक की यह शिकायत उस तक नहीं पहुंची कि छत से रिसकर पानी नीचे तक पहुंच रहा है। सिरिल ने कहा - छत की मरम्मत करवा दीजिए और इतना कहकर वह वापस अपने पौधों में पानी डालने लगा। और इसी के साथ मकान मालिक और किराएदार के उस खूबसूरत रिश्ते का अंत हो गया।

अब मैं उस धोबन के बारे में बताता हूं, जो मेरे घर से कुछ दूरी पर सड़क के दूसरी ओर रहती है। उसका परिवार बेहद गरीब है और वे बहुत अभाव की स्थिति में जीवन बसर करते हैं। उन्हें दोपहर में ही खाना नसीब होता है और बचा-खुचा भोजन वे शाम के लिए रख देते हैं। लेकिन उनकी मामूली-सी झोपड़ी की ओर जाने वाली जो सीढ़ियां हैं, उन पर दोनों ओर टिन के डिब्बों में जिरेनियम के पौधे लगे हुए हैं। हर तरह के रंगों वाले फूलों से वह रास्ता गुलजार रहता है। मैं कितनी भी कोशिश कर लूं, लेकिन उसकी तरह इतने सारे जिरेनियम के पौधे नहीं उगा सकता। क्या वह अपने पौधों को भी वैसे ही डांट लगाती है, जैसे अपने बच्चों को? जो भी हो, लेकिन उसका वह मामूली-सा घर मसूरी के बड़े-बड़े अधिकारियों के आलीशान घरों से भी कहीं ज्यादा खूबसूरत और आकर्षक है।

इस खूबसूरत हिल स्टेशन मसूरी में सभी के घरों में सुंदर बगीचे नहीं हैं। कुछ महलनुमा घर और विशालकाय होटल के बगीचे तो सूखकर बेजान हुए जा रहे हैं। मुरझाती हुई झाड़ियां हैं और सूख चुके गुलाब। इन घरों के मालिक अपनी निजी समस्याओं और दुखों में ही इतने डूबे हुए हैं कि अपने बगीचों की मुर्दनी सूरत पर उनका ध्यान ही नहीं जाता। रसहीन, प्रेमविहीन जिंदगियां हैं और वैसे ही प्रेम और रंग से वंचित सूख चुके बगीचे। लेकिन वहीं दूसरी ओर एन्नी पॉवेल भी हैं, जो 90 साल की उम्र में रोज तड़के उठकर अपने पौधों में पानी डालती हैं। एक हाथ में पानी डालने का झारा लिए हुए एन्नी एक फूल की सेज से दूसरे फूल की सेज का रुख करती रहती हैं। वह पूरे समर्पण के साथ एक-एक पौधे को पानी की फुहारों से नहलाती जाती हैं। वह कहती हैं कि उन्हें ताजे पानी की फुहारों में भीगते हुए फूलों और पत्तियों को निहारना बहुत अच्छा लगता है। इस तरह मानो हर दिन उन्हें एक नई जिंदगी मिलती है।

देहरादून में मेरे नाना-नानी का घर भी चारों तरफ फूल-पत्तियों, पौधों और पेड़ों से घिरा हुआ था। उनका बगीचा बहुत सुंदर और करीने से सजा था। नाना बाग और पेड़ों की देखभाल करते थे और नानी फूलों की। और उन सभी लोगों की तरह जो सालों-साल साथ रहते हैं, मौके-बेमौके उनके बीच भी पौधों की देखभाल को लेकर असहमतियां हो ही जाया करती थीं। जब वे बहस कर रहे होते तो हम भाई-बहन संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षकों की तरह उनका निरीक्षण किया करते। काश उस वक्त मैं इतना बड़ा होता कि उस बगीचे को दूसरों के हाथों में जाने से रोक पाता। खैर, जो भी हो, स्मृतियों को कौन रोक सकता है भला? वह तो आपकी आत्मा की खोह में सुरक्षित मौजूद रहती ही हैं।


लेखक पद्मश्री से सम्मानित ब्रिटिश मूल के साहित्यकार हैं।

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